प्रतिस्पर्धा

प्रतिस्पर्धा या प्रतियोगिता को एक असहगामी सामाजिक प्रक्रिया माना गया है। इसका कारण यह है कि प्रतिस्पर्द्धियों में कम या अधिक मात्रा में एक-दूसरे के प्रति कुछ ईर्ष्या-द्वेष के भाव पाये जाते हैं। प्रत्येक दूसरों को पीछे रखकर स्वयं आगे बढ़ना चाहता है। अपने उद्देश्य को प्राप्त करना चाहता है।

अत्यधिक या अनियन्त्रित प्रतिस्पर्धा समाज में संगठन को ठेस पहुँचाती है और उसे विघटन की ओर ले जाती है परन्तु साथ ही प्रतिस्पर्धा व्यक्तियों, समूहों और राष्ट्रों को प्रगति करने, आगे बढ़ने तथा अपनी स्थिति को ऊँचा उठाने की प्रेरणा भी देती है, कुशलतापूर्वक निरन्तर प्रयत्न करते रहने को प्रोत्साहित करती है। कार्य को उत्तमता के साथ पूरा करने में मदद देती है, आधुनिक समय में प्रतिस्पर्धा जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में पायी जाती है।

खिलाड़ी, विद्यार्थी, व्यापारी, उद्योगपति, वकील, डॉक्टर, राजनीतिज्ञ, कवि, साहित्यकार आदि हर समय एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा करते हैं। जहाँ माँग पूर्ति से अधिक होती है, वहाँ सीमित वस्तु को प्राप्त करने के इच्छुक व्यक्ति एक-दूसरे की होड़ करते हैं, उसकी प्राप्ति का प्रयत्न करते हैं। जहां दो या दो से अधिक व्यक्ति या समूह किसी ऐसे लक्ष्य की प्राप्ति नियमों के अन्तर्गत प्रयत्न करते हैं, जो मांग की तुलना में कम है, इसे प्रतिस्पर्धा कहते हैं।

प्रतिस्पर्धा परिभाषा

प्रतिस्पर्द्धा किसी ऐसी वस्तु को प्राप्त करने के लिए होड़ है जो कि इतनी मात्रा में नहीं पायी जाती है कि उसकी मांग को पर्याप्त रूप से पूरा किया जा सके।

बोगार्ड्स के अनुसार

प्रतिस्पर्द्धा मे दो या अधिक व्यक्ति या समूह समान लक्ष्य को प्राप्त करने का प्रयत्न करते हैं जिसको कोई भी दूसरे के साथ बाँटने के लिए न तो तैयार होता है। और न तो इसकी अपेक्षा की जाती है।

ग्रीन के अनुसार

प्रतिस्पर्द्धा दो या दो से अधिक व्यक्तियों के समान उद्देश्य जो इतने सीमित हैं कि सब उसके भागीदार नहीं बन सकते, को पाने को प्रयत्न करते हैं।’

बीरांज और बीसंज के अनुसार

प्रतिस्पर्द्धा के परिणाम एवं महत्व

1. सहचारी ( सहयोगात्मक) परिणाम

स्वस्थ प्रतिस्पर्धा का सहचारी या संगठनात्मक परिणाम निकलता है। वकील, डॉक्टर, इन्जीनियर, विद्यार्थी, अध्यापक, नेता, अभिनेता, साहित्यकार, उद्योगपति, मजदूर, आदि प्रतिस्पर्द्धा के माध्यम से आगे बढ़ने और अपने लक्षणों को प्राप्त करने का प्रयत्न करते हैं, परन्तु साथ ही अपने-अपने व्यवसाय और वर्ग के हित में संगठन और समितियाँ भी बना लेते हैं। ये संगठन अपने सदस्यों के हित की रक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण कार्य करते हैं। प्रतिस्पर्धा का यह परिणाम समाज के लिए हितकर है।

2. असहचारी (असहयोगात्मक) परिणाम

प्रतिस्पर्द्धा के असहचारी परिणाम उस समय आते हैं जब यह अत्यन्त कटु रूप धारण कर लेती है। ऐसी स्थिति में विभिन्न प्रतियोगी प्रतिस्पर्धा के नियमों की चिन्ता नहीं करते हुए अपने लक्ष्यों की प्राप्ति पर जोर देते हैं। आप प्रतिस्पर्धा Hindibag पर पढ़ रहे हैं।

3. सामूहिक दृढता सम्बन्धी परिणाम

जहाँ व्यक्तियों और समूहों में नियमानुसार स्वस्थ प्रतिस्पर्धा चलती है, वहाँ समूह की दृढ़ता (एकता) बनी रहती है जब प्रतिस्पर्द्धा स्वतन्त्र और उचित ढंग से चलती है तो प्रत्येक को अपनी योग्यतानुसार अपना कार्य सर्वोत्तम ढंग से करने का अवसर मिलता है। इससे समूह सम्बन्ध व्यवस्थित बने रहते हैं और समूह एकता के सूत्र में बंधा रहता है।

4. सामाजिक विघटन सम्बन्धी परिणाम

प्रतिस्पर्द्धा सदैव प्रगति और सामाजिक दृढ़ता में ही योग नहीं देती है। जब नवीन आविष्कारों के कारण समाज में तेजी से परिवर्तन होते हैं तो सामाजिक विघटन की स्थिति उत्पन्न होती है। यहाँ हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि सामाजिक विघटन के लिए उत्तरदायी कारक प्रमुखतः तेजी से होने वाले परिवर्तन हैं और प्रतिस्पर्धा तो केवल सहायक कारक है।

5. प्रगति सम्बन्धी परिणाम

प्रतिस्पर्धा भौतिक व सामाजिक प्रगति में काफी होती है, प्रतिस्पर्धा तेजी से बदलते हुए समाज में पुनः समायोजन में सहायता प्रदान करती है। वह व्यक्ति को उत्तम से उत्तम तरीकों से कार्य करने को प्रेरित करती है, चाहे व्यक्ति ऐसा आर्थिक लाभ, उच्च पद, प्रतिष्ठा, आदि प्राप्त करने के लिए ही करें। व्यक्ति के इस प्रकार के श्रेष्ठ प्रयत्न का लाभ समाज को निश्चित रूप से मिलता है। प्रतिस्पर्धा व्यक्ति और समूह को नवीन प्रविधियों के खोज निकालने और अन्य की तुलना में अधिक उत्तमता से कार्य सम्पन्न करने को प्रोत्साहित करती है, उसके प्रयत्नों से आविष्कार भी होते हैं और सामाजिक प्रगति भी।

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