पितृसत्ता – सामान्य शब्दों में कहा जा सकता है कि जब किसी समाज की संरचना में सत्ता का केन्द्र पुरुषों की प्रस्थिति होती है, तब इस दशा को हम पितृसत्ता कहते हैं। वास्तव में पितृसत्ता एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें परम्परा और व्यवहार के नियमों द्वारा स्त्रियों की तुलना में पुरुषों की शक्ति, अधिकारों और सत्ता को अधिक महत्व दिया जाता है। इसका तात्पर्य है कि पितृसत्ता का अर्थ समझने के लिए सबसे पहले शक्ति और सत्ता के अन्तर को समझना आवश्यक है।

वेवर ने शक्ति और सत्ता के अन्तर को स्पष्ट करते हुए लिखा है कि जब कोई व्यक्ति अपनी कुशलता, सम्पत्ति या दबाव के द्वारा किसी दूसरे व्यक्ति या समूह को अपनी इच्छा के अनुसार काम करने के लिए बाध्य कर लेता है तो इसे उस व्यक्ति की ‘शक्ति’ कहा जाता है। दूसरी ओर जब व्यक्ति को किसी परम्परा, धार्मिक नियम या कानून के द्वारा एक विशेष समूह के व्यवहारों को प्रभावित करने का अधिकार मिल जाता है तो इसे उस व्यक्ति की ‘सत्ता’ कहा जाता है। इस दृष्टिकोण से सत्ता एक ऐसी शक्ति है जिसका सम्बन्ध एक विशेष समाज की संरचना से सम्बन्धित नियमों और परम्पराओं से होता है।

पितृसत्ता

पितृसत्ता पुरुषों की वह शक्ति है जो उन्हें किसी समाज के प्रथागत नियमों और परम्पराओं से मिल है। उदाहरण के लिए, मनुस्मृति में दिया गया यह नियम कि “स्त्रियों का अपना कोई स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं होता उन्हें बचपन में पिता के, युवावस्था में पति के और वृद्धावस्था में पुत्र के संरक्षण में रहना आवश्यक है” एक ऐसा धार्मिक नियम बन गया जिसे भारतीय समाज में पुरुषों की शक्ति से सम्बन्धित एक विशेष सामाजिक व्यवस्था के रूप में देखा जाने लगा। इसी व्यवस्था को हम पितृसत्ता के नाम से सम्बोधित करते हैं।

लर्नर ने अपनी पुस्तक ‘क्रियेशन ऑफ पैट्रियारकी’ में पितृसत्ता को इसकी कुछ विशेषताओं के आधार पर स्पष्ट किया है। लर्नर के अनुसार, पितृसत्ता पुरुषों की शक्ति का संस्थाकरण है। यह महिलाओं पर पुरुषों के अधिकारों का ऐसा विस्तार है जिसके द्वारा पुरुष को स्त्री से श्रेष्ठ मानकर स्त्रियों के जीवन के सभी पक्षों पर व्यावहारिक रूप से पुरुष के अधिकारों को मान्यता दी जाने लगती है। इसका तात्पर्य है कि पितृसत्ता कोई विचारधारा नहीं है, बल्कि सामाजिक व्यवस्था से सम्बन्धित व्यावहारों का एक विशेष रूप है।

जिस समाज में पितृसत्ता का प्रचलन होता है वहां समाज, नातेदारी सम्बन्धों और परिवार में स्त्रियों की तुलना में पुरुषों के अधिकार अधिक होते हैं। विवाह और सम्पत्ति से सम्बन्धित नियम पुरुषों के पक्ष में होते हैं। वंश की परम्परा किसी पुरुष सदस्य के नाम पर चलती है। विवाह के बाद पत्नी को अपने पति के घर जाकर रहना आवश्यक होता है तथा उसका उपनाम अपने पति के उपनाम के अनुसार बदल जाता है। सम्पत्ति का अधिकार व्यावहारिक रूप से उसके पुत्र या पुत्रों को मिल जाता है।

स्त्रियों को अनेक धार्मिक नियमों और प्रथाओं के द्वारा यह विश्वास दिलाया जाता है कि प्रत्येक दशा में अपने पिता, पति या पुत्र के निर्णयों के अनुसार व्यवहार करना ही उनका धर्म है। स्त्री के विधवा होने पर साधारणतया उसे पुनर्विवाह की अनुमति नहीं दी जाती, जबकि विधुर होने की दशा में पुरुष के दूसरे विवाह पर समाज को कोई आपत्ति नहीं होती।

पुरुष अपने द्वारा उपार्जित आय का किसी भी तरह उपयोग करने के लिए स्वतन्त्र होता है, लेकिन यदि स्त्रियों द्वारा कोई आय उपार्जित की जाती है, तो उस पर साधारणतया उसके पिता या पति का अधिकार होता है। स्त्रियों द्वारा स्वयं ही पुरुषों के इस अधिकार को मूक स्वीकृति दी जाती है। वैवाहिक सम्बन्धों, श्रम-विभाजन, सामाजिक आयोजनों और महत्वपूर्ण निर्णयों के क्षेत्र में स्त्रियों को पुरुषों की इच्छा स्वीकार करनी होती है।

पितृसत्ता वाली व्यवस्था में बच्चों का परिचय उनके पिता के वंश के माध्यम से होता है तथा बच्चों को अपने पिता के गोत्र से ही जाना जाता है। वर्तमान सामाजिक विधानों के द्वारा परिवार की सम्पत्ति में स्त्रियों को भी समान अधिकार दिए गए हैं, लेकिन व्यावहारिक रूप से एक पितृसत्तात्मक व्यवस्था में स्त्रियों द्वारा आज भी अपने इस अधिकार का उपयोग नहीं किया जाता।

परिवार का मुखिया या कर्ता कोई पुरुष सदस्य होता है तथा उसके द्वारा सभी महत्वपूर्ण कार्यों और शक्तियों का वितरण पुरुष सदस्यों के बीच ही किया जाता है। यदि परिवार को परम्परा के द्वारा कोई उपाधि या सम्मान सूचक पद मिला होता है तो पिता की मृत्यु के बाद इसका हस्तान्तरण उसके सबसे बड़े पुत्र को हो जाता है। धार्मिक क्रियाओं तथा संस्कारों की पूर्ति में पुरुषों के अधिकार स्त्रियों की तुलना में कहीं अधिक होते हैं। यही कारण है कि पितृसत्ता वाली व्यवस्था में पुत्री की अपेक्षा पुत्र जन्म को अधिक महत्व मिलने लगता है।

जहां तक परम्परागत भारतीय सामाजिक व्यवस्था का प्रश्न है, विभिन्न सांस्कृतिक प्रमाणों से यह स्पष्ट होता है कि यहां महाभारत काल के बाद अथवा ईसा से लगभग 1200 वर्ष पहले से सामाजिक व्यवस्था को एक ऐसा रूप दिया जाने लगा जिसमें स्त्रियों की अपेक्षा पुरुषों की शक्ति को अधिक महत्वपूर्ण माना गया। कुछ मामूली परिवर्तनों के साथ यह व्यवस्था किसी-न-किसी रूप में आज भी प्रभावपूर्ण बनी हुई है।

इस सम्बन्ध में यह ध्यान रखना आवश्यक है कि सभ्य समाजों से पृथक् रहने वाली जनजातियों में बहुत प्राचीन काल से ही स्त्रियों की सत्ता को विशेष मान्यता मिलती रही है। इसके बाद भी हिन्दू और ईसाई संस्कृतियों के सम्पर्क में आने वाली जनजातियां भी धीरे-धीरे पितृसत्ता को मान्यता देने के पक्ष में होती जा रही हैं। इसी का परिणाम है कि आज अधिकांश जनजातियों में स्त्रियां अपने परम्परागत सामाजिक और आर्थिक अधिकारों से वंचित हो रही हैं तथा स्त्रियों को उन अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है जिसका सम्बन्ध मुख्य रूप से हिन्दू स्त्रियों के जीवन से था।

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3. मातृसत्ता
4. वंश क्रम
5. वंश समूह
8. भारत में जाति व्यवस्था: परिप्रेक्ष्य, विशेषताएं एवं परिवर्तन के आयाम1. जाति अर्थ परिभाषा लक्षण

पितृसत्ता के कारण एवं परिणाम

भारतीय समाज में पितृसत्ता की व्यवस्था अनेक दशाओं का संयुक्त परिणाम रही है। आज से लगभग 2000 वर्ष पूर्व जब स्मृतिकारों ने मौलिक सामाजिक व्यवस्थाओं तथा व्यवहार के समताकारी तरीकों को बदलकर एक नई सामाजिक और धार्मिक व्यवस्था को विकसित करना आरम्भ किया तब उन्होंने स्त्रियों को उन सभी अधिकारों से वंचित करना आरम्भ कर दिया जो उन्हें वैदिक कालीन सामाजिक व्यवस्था से मिले हुए थे।

धीरे-धीरे स्त्रियां शिक्षा के अधिकार से वंचित हो गईं। समाज में पुरोहिती धर्म का प्रभाव बढ़ जाने से स्त्रियों को धार्मिक आधार पर जो शिक्षाएं दी जाने लगीं, उन्हीं को उन्होंने अपने नैतिक और धार्मिक कर्तव्यों के रूप में देखना आरम्भ कर दिया। पितृसत्ता को मजबूत करने में संयुक्त परिवारों का विशेष योगदान रहा। यहां जैसे-जैसे पवित्रता और अपवित्रता से सम्बन्धित जाति व्यवस्था के नियमों का प्रभाव बढ़ता गया, पुरुषों के अधिकारों में भी वृद्धि होने लगी।

पितृसत्ता के अन्तर्गत जब स्त्रियों को जीविका उपार्जन और सम्पत्ति अधिकारों से वंचित कर दिया गया तो वे अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए पूर्णतया पुरुषों पर निर्भर हो गईं। इन सभी दशाओं के बीच भारतीय समाज में पितृसत्ता का लगातार विस्तार होता गया। वास्तव में पितृसत्ता अपने आप में एक दोषपूर्ण व्यवस्था नहीं है। विश्व के अधिकांश समाजों में पितृसत्ता का प्रचलन होने के बाद भी सामाजिक, आर्थिक तथा धार्मिक जीवन में स्त्रियों की सहभागिता किसी तरह कम नहीं है।

इसका अर्थ है कि पितृसत्ता तव एक दोषपूर्ण व्यवस्था बन जाती है जब व्यवहार के नियम लिंग-भेद पर आधारित होने के साथ ही असमानताकारी और शोषण से युक्त होने लगते हैं। भारत में स्त्रियों के जीवन से सम्बन्धित अनेक समस्याएं जैसे दहेज-प्रथा, बाल-विवाह, बहुपत्नी-विवाह, पर्दा प्रथा, आर्थिक शोषण तथा विधवा-जीवन की समस्याओं का सम्बन्ध यहां पितृसत्ता पर आधारित व्यवहार के नियमों से ही है।

इस सम्बन्ध में के. एम. पणिक्कर ने लिखा है कि भारत में पितृसत्ता की विघटित व्यवस्था के फलस्वरूप एक चेतना शून्य समाज का निर्माण होने लगा जिसमें स्त्रियों द्वारा बच्चों को दी जाने वाली सीख शुरू से ही आत्मघाती बनने लगी। नारी स्वतन्त्रता के वर्तमान युग में आज जैसे-जैसे स्त्रियों में शिक्षा बढ़ने के साथ आर्थिक और राजनीतिक जीवन में उनकी भागीदारी बढ़ती जा रही है पितृसत्ता के परम्परागत रूप को चुनौती मिलने लगी हैं।

इसके फलस्वरूप एक ओर सामाजिक काननों के द्वारा समकालीन व्यवहारों को प्रोत्साहन मिला है तो दूसरी ओर स्वयं पुरुषों को भी पितृसत्ता के अन्तर्गत स्त्रियों के मानवोचित अधिकारों को स्वीकार किया जाने लगा है। इसी का परिणाम है कि पितृसत्ता से सम्बन्धित नातेदारी व्यवस्था के अन्तर्गत रक्त और विवाह से सम्बन्धित नातेदारों के सम्बन्धों में भी एक स्पष्ट परिवर्तन देखने को मिलने लगा है।

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