पारिस्थितिक पिरामिड

पारिस्थितिक पिरामिड – प्रत्येक पारिस्थितिक तंत्र में प्राथमिक उत्पादों, प्रथम व द्वितीय श्रेणी के उपभोक्ताओं तथा शीर्ष मांसाहारी जीवों की संख्या, जैव भार और ऊर्जा मात्रा में कुछ सम्बन्ध होता है। अगर उत्पादों एवं उपभोक्ताओं के बीच उनकी संख्या, जैवभार एवं ऊर्जा मात्रा के सम्बन्धों का आलेखी निरूपण किया जाये, तो एक स्तूपाकार आकृति बनती है। जिसके आधार भाग पर उत्पादक व प्राथमिक, द्वितीयक, तृतीयक उपभोक्ता आदि आरोही क्रम में व्यवस्थित होते हैं। इन आकृतियों को पारिस्थितिक पिरामिड कहते हैं।

पारिस्थितिक पिरामिड

पारिस्थितिक पिरामिडों की संकल्पना को ब्रिटेन के पारिस्थितिवेत्ता ‘चार्ल्स इल्टन ने सन् 1927 में प्रस्तुत किया था। भोजन शृंखला में सामान्यतया 4 से 5 पोषण स्तर होते हैं। पारिस्थितिक पिरामिड में जितने अधिक पोषण स्तर होंगे, उनमें जीवों की संख्या प्रत्येक स्तर पर कम होती जायेगी, लेकिन उनका आकार बड़ा होता जायेगा। प्रत्येक पारिस्थितिक पिरामिड के आधार पर उत्पादक स्तर तथा अनुक्रमित स्तर शीर्ष पर होगा। अतः स्पष्ट है कि पारिस्थितिक तंत्र के विभिन्न जैविक घटकों के पोषण स्तरों के सम्बन्ध को त्रिभुजाकार आकृतियों द्वारा प्रदर्शित किया जा सकता है, जिन्हें ‘पारिस्थितिक पिरामिड’ कहते हैं।

पारिस्थितिक पिरामिड के प्रकार

पारिस्थितिक पिरामिड के प्रकार निम्नलिखित हैं

संख्या पिरामिड

पारिस्थितिक तंत्र के उत्पादकों तथा प्राथमिक, द्वितीयक, तृतीयक एवं उच्च श्रेणी के उपभोक्ताओं की संख्या के सम्बन्धों के आरेखी चित्रण में जो स्तूप बनता है, उसे ‘संख्या का स्तूप’ कहते हैं। इस पिरामिड के आधार पर उत्पादक जीव होते हैं, जिनकी संख्या अधिक होती है, लेकिन शीर्ष की ओर प्रत्येक पोषण स्तर पर उपभोक्ता जीवों की संख्या क्रमशः घटती जाती है।

पारिस्थितिक पिरामिड की विशेषताएं

यह पिरामिड प्रदर्शित करता है कि प्राथमिक उत्पादकों (घासों) की संख्या सर्वाधिक होती है। इन उत्पादकों को आहार बनाने वाले जीवों की संख्या कम होती है। इन शाकाहारी जीवों को भोजन बनाने वाले मांसाहारी जीवों की संख्या और कम हो जाती है तथा इन मांसाहारी जीवों का आहार करने वाले सर्वहारी जीवों जैसे मनुष्य की संख्या और कम हो जाती है। झील पारिस्थितिक तंत्र इस प्रकार के पिरामिड का सर्वोत्तम उदाहरण है।

किसी भी पारिस्थितिक तंत्र जैसे—वन, तालाव, घास स्थल आदि में उत्पादकों की संख्या सर्वाधिक होती है। जैसे-जैसे उत्पादकों से उपभोक्ताओं की ओर बढ़ते हैं, जीवों की संख्या कम होती जाती है। किसी पारिस्थितिक तंत्र में अगर जीवों की संख्या का आरेखी निरूपण किया जाये, तो प्रायः एक सीधा स्तूप बनता है। झील तंत्र में पिरामिड के आधार पर उत्पादक तत्त्व जैसे-एलगी, डायटम आदि होते हैं, जिनकी संख्या बहुत अधिक होती है।

द्वितीय पोषण स्तर पर शाकाहारी जीव आते हैं, जिनकी संख्या प्रथम पोषण स्तर के उत्पादकों की तुलना में कम होती है। तृतीय पोषण स्तर पर कुछ मांसाहारी जीव आते हैं, जिनकी संख्या शाकाहारी जीवों की अपेक्षा कम होती है। शीर्ष पोषण स्तर पर कुछ ही शीर्ष मांसाहारी जीव होते हैं। कभी-कभी संख्या पिरामिड की आकृति उलट जाती है अर्थात् पिरामिड का आधार नुकीला और शीर्ष चौड़ा हो जाता है। ऐसे पिरामिड को ‘विलोम संख्या पिरामिड’ कहा जाता है। वन पारिस्थितिकी विलोम संख्या पिरामिड का एक उदाहरण है।

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पारिस्थितिक पिरामिड

जैव भार पिरामिड

किसी पारिस्थितिक तंत्र के इकाई क्षेत्र में दिए गये समय में उपस्थित कार्बनिक पदार्थों की मात्रा को जैव भार कहते हैं। इस पिरामिड में भोजन शृंखला के भोजन जाल के सभी पोषण स्तरों पर समस्त जीवों के सकल भार को दिखाया जाता है। इसमें आधार पर प्राथमिक उत्पादों का भार प्रदर्शित किया जाता है। इसमें आधार से शीर्ष की ओर प्रत्येक पोषण स्तर पर जैव-भार में ह्रास देखने को मिलता है।

शाकाहारियों द्वारा भुंजित उत्पादकों का सकल जैव भार शाकाहारियों के सम्पूर्ण जैव भार से अधिक होता है। इसी प्रकार द्वितीयक उपभोक्ताओं का सकल जैव भार शाकाहारी जीवों की अपेक्षा कम होता है। इसी तरह तृतीयक उपभोक्ताओं का जैव भार द्वितीयक उपभोक्ताओं की अपेक्षा कम होता है। यही घटता हुआ क्रम आगे चलता रहता है।

यदि घासस्थलीय पारिस्थितिक तंत्र के विभिन्न पोषण स्तरों पर उपस्थित जीवों के जीव भार के आधार पर आलेखी चित्र बनाया जाये तो वह एक सीधे पिरामिड बनेगा। उदाहरण के लिए, 600 टन घास 90 टन टिड्डों हेतु पर्याप्त होगी। 90 टन टिड्डे, 12 टन मेंढकों हेतु पर्याप्त हैं। 12 टन मेंढक 2 टन सर्पों के भोजन हेतु पर्याप्त हैं तथा 2 टन साँप आधा टन बाजों के लिए पर्याप्त भोजन प्रदान करते हैं।

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पारिस्थितिक पिरामिड

ऊर्जा पिरामिड

ऊर्जा पिरामिड में पारिस्थितिक तंत्र की उत्पादकता को प्रदर्शित किया जाता है। इसमें भोजन शृंखला व भोजन जाल के प्रत्येक पोषण स्तर पर ऊर्जा के स्थानान्तरण को दिखाया जाता है। इसमें प्रत्येक पोषण स्तर की चौड़ाई, इस ऊर्जा की मात्रा का संकेत देती है, जो एक पोषण स्तर से निकलकर दूसरे पोषण स्तर में जाती है। इस पिरामिड से यह पता चलता है कि उत्पादक सर्वाधिक ऊर्जा ग्रहण करते हैं, लेकिन उन पर पलने वाले परपोषी जीव घटती दर से ऊर्जा प्राप्त करते हैं। यदि उत्पादकों को ऊर्जा मिलने में व्यवधान आने गले, तो उन पर पलने वाले परपोषी जीव विनष्ट होने लगेंगे।

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