पारिस्थितिक तंत्र

पारिस्थितिक तंत्र – किसी भी प्रदेश की वनस्पति जंतुओं का वितरण वहां की जलवायु पर निर्भर करता है साथ ही उस प्रदेश की जलवायु वहां की वनस्पति द्वारा प्रभावित होती है और वनस्पति उस प्रदेश में पाए जाने वाले जंतुओं के वितरण को भी प्रभावित करती है इस प्रकार भूमि और वनस्पति में तथा मिट्टी वह जंतु समूह में पारस्परिक संबंध होते हैं। एक विशेष प्रदेश में पाए जाने वाले एक ही जाति के या एक दूसरे से मिलते जुलते जातियों के जीवो के समूह को समष्टि और उस प्रदेश की समस्त समष्टियों को जैविक समुदाय या अजीबी वातावरण के पारस्परिक संबंध को इकोसिस्टम या पारिस्थितिकी समूह कहते हैं।

प्रत्येक जीवित प्राणी चाहे वह जंतु हो या पौधा अपने वातावरण से घनिष्ठ संबंध रखता है। पेड़ पौधे मिट्टी से जल एवं खनिज का प्रयोग करते हैं। पेड़ पौधे वायुमंडल से कार्बन डाइऑक्साइड गैस प्राप्त करके जंतु व मानव के लिए भोजन निर्मित करते हैं। अतः जैव जगत के प्राकृतिक परिवेश स्वरूप के निर्माण में वनस्पति का बड़ा हाथ है।

पारिस्थितिक तंत्र
पारिस्थितिक तंत्र

पारिस्थितिक तंत्र

सर्वप्रथम ए• जी• टेन्सले ने सन् 1935 में पारिस्थितिक तंत्र शब्द का प्रयोग किया। प्रत्येक जैव समुदाय के जीव एक दूसरे से परस्पर अनुक्रिया करते हैं जिसके फलस्वरूप आवश्यक ऊर्जा एक पोषण स्तर से दूसरे और दूसरे से तीसरे में स्थानांतरित होकर समुदाय के सभी जीवो की आधारभूत आवश्यकता की पूर्ति करती है। यह अनुक्रिया समुदाय के केवल जीवित प्राणियों तक ही सीमित नहीं होती है। स्वपोषी पौधे अजैविक वातावरण से विभिन्न भौतिक कार्य को एवं रासायनिक पदार्थों जैसे सूर्य का प्रकाश, कार्बन, नाइट्रोजन, ऑक्सीजन , फास्फोरस, जल आदि की परस्पर क्रिया द्वारा कार्बोहाइड्रेट प्रोटीन व वसा का उत्पादन करते हैं।

यही कार्बनिक पदार्थ खाद्य पदार्थ के रूप में विभिन्न उपभोक्ताओं की ऊर्जा तथा खनिज की आवश्यकता को पूर्ण करते हैं। जब उपभोक्ता की जीवन क्रिया समाप्त हो जाती है तो वह नष्ट हो जाता है और तब सूक्ष्म जीव जीवाणु एवं कवक इन का विघटन करते हैं। इस प्रकार इस ऊर्जा तथा खनिज पदार्थों का प्रवाह होता रहता है और याचक लगातार चलता रहता है।

पारिस्थितिक तंत्र परिभाषा

पर्यावरण तथा जैव समुदाय के पारस्परिक संबंधों को पारिस्थितिकी कहते हैं। पारिस्थितिकी तत्व एक आधारभूत कार्यात्मक इकाई है जिसमें वातावरण के जैव व अजैव तत्व जो एक दूसरे की विशेषताओं को प्रभावित करते हैं। दोनों ही प्रकार के तत्व पृथ्वी पर जीवन बनाए रखने के लिए आवश्यक है।

पारितंत्र पारिस्थितिकी की वह मूलभूत इकाई है, जिसमें जैविक तथा अजैविक वातावरण एक दूसरे पर अपना प्रभाव डालते हुए पारस्परिक अनुक्रिया द्वारा ऊर्जा एवं रासायनिक पदार्थों के निरंतर प्रवाह से उस तंत्र की कार्यात्मक गतिशीलता बनाए रखते हैं।

ओडम

पारिस्थितिक तंत्र एक कार्यशील एवं परस्पर क्रियाशील तंत्र होता है जिसका संगठन एक या अधिक जीवो तथा उनके प्रभावी पर्यावरण भौतिक एवं जैविक दोनों से होता है।

पारिस्थितिक तंत्र
पारिस्थितिक तंत्र

पारिस्थितिक तंत्र के घटक

पारिस्थितिक तंत्र की संरचना दो घटकों से मिलकर होती है, इन्हें क्रमश: जैविक तथा अजैविक घटक के नाम से जाना जाता है। जैविक घटक में सभी जीवित जीव सम्मिलित हैं। अजैविक घटक के अंतर्गत निर्जीव वातावरण आता है। अजैविक घटक विभिन्न जैविक घटकों को नियंत्रित करता है।

1. जैविक घटक

पारिस्थितिक तंत्र के इस घटक में सभी जीवित जीव सम्मिलित हैं, जैविक घटक निम्नलिखित होते हैं-

उत्पादक

परितंत्र के स्वपोषी घटक में उत्पादक या ऊर्जा परिक्रमा सम्मिलित है। इसके अंतर्गत वे सभी हरे पौधे आते हैं जो प्रकाश संश्लेषण की क्रिया द्वारा कार्बन डाइऑक्साइड एवं जल को पर्णहरिम की उपस्थिति में सूर्य के प्रकाश द्वारा ग्लूकोस में परिवर्तित करते हैं। यह ग्लूकोज पौधों में भोजन के रूप में एकत्रित होता रहता है और श्वसन क्रिया के फल स्वरुप ऊर्जा प्रदान करता है। यही ऊर्जा विभिन्न जैविक क्रियाओं में काम आती है।

6CO2+12H2OC6H12O6+6O2+6H2O

उपभोक्ता

इनमें प्रकाश संश्लेषण की क्षमता नहीं होती है। यह अपना भोजन प्राथमिक उत्पादों अथवा अन्य जीव धारियों को खाकर प्राप्त करते हैं। प्राथमिक उत्पादों को ग्रहण करने वाले जीव धारियों को शाकाहारी तथा इन शाकाहारी जीवो को खाने वाले अन्य जीव धारियों को मांसाहारी कहते हैं। उपभोक्ता जंतु पौधों को या उनके बाबू को भोजन के रूप में लेकर उनमें संचित कार्बनिक पदार्थों को सरल पदार्थों में परिवर्तित करते हैं, जिसके फलस्वरूप शरीर में अन्य नए उतको व कार्बनिक पदार्थों का निर्माण होता है।

पारिस्थितिक तंत्र परिभाषा

अपघटनकर्ता

जो जैविक घटक उत्पादक तथा उपभोक्ता की मृत्यु के पश्चात उसके शरीर का अपघटन करते हैं तथा अपघटन के फलस्वरुप निर्मित साधारण पदार्थों द्वारा अपना भोजन एवं ऊर्जा प्राप्त करते हैं, ऐसे जीवो को अपघटनकर्ता कहा जाता है। इस श्रेणी के अंतर्गत जीवाणु एक्टीनोमाइसीट्स तथा कवक आते हैं। इन्हें मृतपोषी भी कहते हैं।

ये मृत या जीवित जीवद्रव्य की जटिल संरचना को वियोजित करके सरल कार्बनिक पदार्थों में से कुछ का अवशोषण करते हैं तथा अन्य अकार्बनिक पदार्थों को वातावरण में वापस सूचित करते हैं जिसे फिर से स्वपोषी प्राप्त करते हैं। अपघटक मृत पौधों तथा जंतुओं का अपघटन करके पृथ्वी की सफाई करते हैं इसलिए इन्हें पृथ्वी का मेहतर भी कहा जाता है।

2. अजैविक घटक

अजैविक घटक को कार्बनिक, अकार्बनिक तथा भौतिक तीन घटकों में विभाजित किया जा सकता है-

अकार्बनिक घटक

इसके अंतर्गत अकार्बनिक तत्व जैसे कैल्शियम, फॉस्फोरस, मैग्नीशियम, नाइट्रोजन, पोटैशियम तथा सल्फर आदि वायुमंडल की गैसें, ऑक्सीजन, नाइट्रोजन, कार्बन डाइऑक्साइड तथा अमोनिया आदि भी सम्मिलित हैं। जल भी एक महत्वपूर्ण अकार्बनिक घटक है। पारिस्थितिक तंत्र को इन पदार्थों की किसी भी समय उपस्थिति को स्थाई गुणवत्ता के नाम से भी जाना जाता है।

कार्बनिक घटक

इसके अंतर्गत मृत जंतुओं एवं पौधों के कार्बनिक योगिक प्रोटीन कार्बोहाइड्रेट्स तथा वसा और अपघटन द्वारा उत्पन्न पदार्थ ह्यूमस व यूरिया आदि आते हैं। अकार्बनिक रसायन जैसे पर्णहरिम और कार्बनिक पदार्थ की मात्रा और वितरण जो जीव पर्यावरण में उपस्थित होता है इसे जैव रासायनिक संरचना भी कहते हैं, क्योंकि वह पारिस्थितिक तंत्र के जैविक तथा अजैविक घटकों को आपस में जोड़ती है।

भौतिक घटक

इसके अंतर्गत दिए गए क्षेत्र के जलवायुवीय कारक आते हैं जैसे प्रकाश, ताप, हवा व विद्युत। सौर ऊर्जा सबसे प्रमुख भौतिक घटक है जिसे हरे पौधे का प्रर्णहरिम विकिरण ऊर्जा के रूप में लेता है। पौधे इस भौतिक ऊर्जा को रासायनिक ऊर्जा में परिवर्तित करते हैं। जो पौधों के अंदर कार्बनिक पदार्थ के रूप में संचित रहती है। यही ऊर्जा संपूर्ण जैविक समुदाय में प्रवाहित होती है और इसी के द्वारा पृथ्वी पर जीवन संभव है।

पर्यावरण

पारिस्थितिक तंत्र की विशेषताएं

पारिस्थितिक तंत्र की मूलभूत विशेषताएं निम्न हैं-

  1. किसी निश्चित स्थान इकाई वाला पारिस्थितिकी तंत्र उस क्षेत्र के सभी जीवधारियों एवं उसके भौतिक पर्यावरण के सकल योग का प्रतिनिधित्व करता है।
  2. इसकी संरचना तीन मूलभूत संगठनों द्वारा होती है-
    1. ऊर्जा संगठन
    2. जैविक संगटक
    3. अजैविक या भौतिक संगटक
  3. पारिस्थितिक तंत्र भूतल पर एक सुनिश्चित क्षेत्र धारण करता है। यह पारिस्थितिक तंत्र का क्षेत्रीय आयाम होता है।
  4. पारिस्थितिक तंत्र का समय इकाई के संदर्भ में पर्यवेक्षण किया जाता है अर्थात् पारिस्थितिक तंत्र का समय आयाम भी होता है।
  5. जैविक, ऊर्जा तथा अजैविक संगठन के मध्य जटिल अंतः क्रियाएं होती हैं। साथ ही साथ विभिन्न जीवों में भी पारस्परिक क्रियाएं होती हैं।
  6. पारिस्थितिक तंत्र प्राकृतिक संसाधन तंत्र होते हैं।
  7. यह संरचित तथा सुसंगठित तंत्र होता है।
  8. पारिस्थितिक तंत्र विभिन्न प्रकार की ऊर्जा द्वारा चालित होता है परंतु सौर्यिक ऊर्जा सर्वाधिक महत्वपूर्ण होती है।
  9. पारिस्थितिक तंत्र की निजी उत्पादकता होती है। वास्तव में पारिस्थितिक तंत्र की उत्पादकता उसमें ऊर्जा की मात्रा की सुलभता पर निर्भर करती है। उत्पादकता किसी क्षेत्र में प्रति समय इकाई में जैविक पदार्थों की वृद्धि दर की द्धोतक होती है।

पारिस्थितिक तंत्र के कार्य

पारिस्थितिक तंत्र की कार्यप्रणाली को समझने के लिए उसकी संरचना का ज्ञान होना आवश्यक है कोई भी पारिस्थितिक तंत्र प्राकृतिक दशाओं के अनुरूप अपना कार्य करता है। इसके अंतर्गत हम उन बातों का अध्ययन करते हैं जैसे कि हरे पौधे 1 वर्ष में कितना प्रकाश ग्रहण करते हैं, शाकाहारी जीवधारी कितना भाग हरे पौधों का खाते हैं तथा कितने शाकाहारी, मांसाहारी जीवों द्वारा खाए जाते हैं।

संरचनात्मक तथा कार्यात्मक रूप से पारिस्थितिक तंत्र के जैविक और अजैविक घटक के बीच इतना घनिष्ठ संबंध होता है कि उन्हें अलग करना बहुत ही कठिन है। हरे पौधे सूर्य कि विकिरण ऊर्जा का स्थायीकरण तथा मृदा में पाए जाने वाले खनिज तत्वों की सहायता से या वातावरण में पाए जाने वाले तत्वों के साथ जटिल कार्बनिक पदार्थों का निर्माण करते हैं।

कुछ वैज्ञानिक उत्पादक शब्द के स्थान पर परिवर्तक या पारक्रमी के प्रयोग को अधिक उचित बताते हैं क्योंकि उत्पादक शब्द ऊर्जा की दृष्टि से उपयुक्त नहीं लगता है। पारिस्थितिक वैज्ञानिक यह तथ्य रखते है कि हरे पौधे कार्बोहाइड्रेट को बनाते हैं न कि ऊर्जा को। चूंकि ये सौर ऊर्जा को रासायनिक में परिवर्तित करते हैं अत: इन्हें परिवर्तक कहना काफी उपयुक्त होगा।

जापान तटीय प्रदेश

मनुष्य और पारिस्थितिक तंत्र

मनुष्य निम्न रूप में पारिस्थितिक तंत्र में अस्थिरता उत्पन्न करता है-

  1. प्राकृतिक वनस्पति का पूर्ण रूप से या आंशिक रूप से विनाश करके
  2. जंतुओं की मौलिक जातियों का विनाश करके
  3. मौलिक जंतुओं या वनस्पतियों का अन्य जंतुओं या वनस्पतियों द्वारा प्रतिस्थापन करके
  4. किसी क्षेत्र में ऐसे विदेशी जंतुओं या पौधों का प्रवेश कराकर जो पहले उस क्षेत्र के मूल निवासी थे।
  5. पारिस्थितिक तंत्र के एक या अधिक मौलिक संगठनों में परिवर्तन करके जैसे भूमि उपयोग में परिवर्तन वनों के स्थान पर कृषि का विकास प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्र को विनाश कर के नगरों एवं उद्योगों का विकास आदि।
  6. रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशी शाकनाशी रसायनों तथा कई प्रकार के सेंथेटिक यौगिकों के प्रयोग द्वारा प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्रो में नए तत्वों का प्रवेश कराके।
  7. वायुमंडल की गैसों के मौलिक अनुपात में घटा बड़ी करके।
  8. पर्यावरणीय पक्रमों में हस्तक्षेप करके।
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