पारिस्थितिकी

पारिस्थितिकी शब्द वर्तमान में प्रचलित Ecology शब्द का हिंदी अनुवाद है। Ecology शब्द का उद्गम ग्रीक भाषा के 2 शब्दों Oikos= House या घर तथा Logus= Study या अध्ययन से हुआ है। इस शब्द के जन्मदाता रिटर्न ए सर्वप्रथम 1807 में इस शब्द का प्रयोग किया लेकिन जर्मन वैज्ञानिक अर्नेस्ट हैकल ने इस शब्द की पूर्ण व्याख्या करके इसे परिभाषित किया।

पृथ्वी पर समस्त प्राणी भौतिक वातावरण एवं उद्विकास यह प्रक्रिया पथ तथा आपसी संबंधों द्वारा जुड़े हुए हैं। एक सजीव दूसरे को भोजन व आवास प्रदान कर सकता है या एक दूसरे के लिए उपयोगी तथा हानिकारक पदार्थ पैदा कर सकता है। दोनों भोजन व आवास के लिए संघर्ष कर सकते हैं। अतः सजीव का उसके जैविक व अजैविक वातावरण के पारस्परिक संबंधों के अध्ययन को पारिस्थितिकी कहते हैं।

पारिस्थितिकी
पारिस्थितिकी

पारिस्थितिकी परिभाषा

पारिस्थितिकी जीव अथवा जीवो के समूह का पर्यावरण के साथ संबंध का अध्ययन है, या वह जीवों और पर्यावरण के अंतर संबंधों का विज्ञान है।

ओडम

परिस्थितिकी वह विज्ञान है जो सभी जीवो का संपूर्ण पर्यावरण के साथ पूर्ण संबंधों का अध्ययन कराता है।

टेलर

पारिस्थितिकी जीवधारियों और उनके पर्यावरण के मध्य अन्याश्रित संबंधों का अध्ययन है।

हैकेल के अनुसार

पारिस्थितिकी जीवन का उनके पर्यावरण के संबंध में अध्ययन है।

वार्मिंग के अनुसार

पारिस्थितिकी को समुदाय विज्ञान के रूप में संबोधित किया गया है।

फेडरिक क्लिमेटस के अनुसार
विद्यालय वार्षिकोत्सवः संस्कृत निबंध
पारिस्थितिकी

परिस्थितिकी के उद्देश्य

मानव जीवन में आधुनिक समय में अनेक समस्याएं हैं, जिनका किसी ना किसी प्रकार से पारिस्थितिकी से संबंध है और इनका निराकरण पारिस्थितिकी के ज्ञान के द्वारा ही संभव है। मानव जीवन के उत्थान में इनकी महत्वपूर्ण पूर्ण भूमिका है। पारिस्थितिकी का ज्ञान मानव जाति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। मानव स्वयं भी एक जीवधारी और अपने भोजन कपड़े दवाओं आदि के लिए सदैव अपने वातावरण के विभिन्न जीव धारियों और जैविक घटकों पर निर्भर रहता है।

  1. हमें अपने जीवन को सरल व स्वस्थ बनाए रखने के लिए पारिस्थितिकी का पूर्ण ज्ञान होना आवश्यक है जिससे वातावरण के विभिन्न घटकों से उचित तालमेल बैठाकर अपनी दैनिक जीवन क्रियाओं का सही संचालन कर सकें।
  2. भोजन कपड़े और सदियों आदि के लिए सभी पशुओं, पौधों, बगीचों, जंगलों, तालाबों और समुद्र आदि का संरक्षण पूर्ण सदुपयोग और उत्पादन वृद्धि उत्पाद एवं संरक्षण परिस्थितिकी के उचित ज्ञान से ही संभव है।
  3. विज्ञान की इस शाखा से जनसंख्या पर उचित नियंत्रण लगाना भी संभव हुआ है।
पारिस्थितिकी के लाभ

परिस्थितिकी का महत्व

  1. पारिस्थितिकी के सिद्धांतों के आधार पर प्राकृतिक समुदायों के क्रियात्मक से संबंधों को समझा जा सकता है।
  2. इसके द्वारा विभिन्न क्षेत्र जैसे वन मृदा सागर तालाब झील आज के वातावरण एवं इनके जीवो के सह संबंधों का अध्ययन किया जाता है।
  3. इसके सिद्धांतों का वर्णन में शस्य विज्ञान, फलोद्यान, पुण्योद्यान, वन, मत्स्य उत्पादन आदि के क्षेत्र में सफलता पूर्वक उपयोग किया जा रहा है।
  4. इसके अध्ययन में प्रचलित भोज एवं मत्स्य आदि के उत्पादन व गुणवत्ता में वृद्धि करना संभव हो सका है।
  5. इसके ज्ञान से ही अपारंपरिक ऊर्जा स्रोतों का उपयोग संभव हो सका है।
  6. इसके अध्ययन से खतरनाक कीटों का जैविक नियंत्रण संभव हो सका है।

पारिस्थितिकी संतुलन

जीव धारियों को जीवित रहने के लिए संतुलित परिस्थिति तंत्र की आवश्यकता होती है। जीव धारियों की उत्तरजीविता उत्पादन व उपभोग के रिश्ते पर टिकी रहती है। प्राथमिक उत्पादक स्थलीय व जलीय पौधे होते हैं। बाकी सभी जंतु उपभोक्ता होते हैं लेकिन उपभोक्ता कई ऊर्ध्वाधर श्रेणियों में बांटे होते हैं और हर ऊपर की श्रेणी के जंतु उपभोक्ता के लिए नीचे की श्रेणी का उपभोक्ता उत्पादन का काम करता है क्योंकि उसीको खाकर उसके ऊपर की श्रेणी का उपभोक्ता जीवित रहता है।

पर्यावरण भूगोल के उद्देश्य

प्रत्येक परिस्थिति तंत्र में कई खाद्य श्रंखला होती है। यह संख्याएं आपस में मिलकर खाद्य जाल बनाते हैं इस प्रकार एक खाद्य जाल में कई वैकल्पिक रास्ते होते हैं। किसी परिस्थिति तंत्र के खाद्य जाल में खाद्य श्रंखला के जितने अधिक वैकल्पिक रास्ते होते हैं वहां तंत्र उतना ही अधिक संतुलित होता है और जीवों की संख्या स्थित रहती है। जब किसी खाद्य जाल में एक खाद्य संख्या में किसी उपभोक्ता की संख्या कम होने लगती है। तो उसके ऊपर की श्रेणी के उपभोक्ता के सामने खाद्य समस्या उत्पन्न हो जाएगी क्योंकि वह उसी कम होती संख्या वाले को खाकर जीवित रहता था।

अब ऊपर वाला उपभोक्ता अपना भोजन अन्य खाद्य श्रृंखला के उसी श्रेणी से खाने लगेगा फिर कुछ दिन बाद उसकी अपनी ही खाद्य श्रंखला में निचली श्रेणी का उपभोक्ता अपनी संख्या बढ़ा लेगा। अतः अपनी ऊपर की श्रेणी के उपभोक्ता के लिए पर्याप्त संख्या में भोजन उपलब्ध हो जाएगा। इस प्रकार एक खाद्य जाल में कई प्रकार के खाद्य श्रंखला ओं के वैकल्पिक उपाय रहते हैं। अंतत: श्रेणी का उपभोक्ता अपने लिए भोजन का वैकल्पिक रास्ता ढूंढ ही लेता है और इससे परिस्थिति तंत्र में संतुलन बना रहता है।

भारत में पारिस्थितिकी विकास

पारिस्थितिकी विकास के भौगोलिक क्षेत्र को भूगोलविदो ने संभावित के आधार पर 8 भागों में विभाजित किया-

  1. हिमालय परिस्थिति क्षेत्र पश्चिमी हिमालय अल्पाइन क्षेत्र हिमालय नागालैंड से अरुणाचल तक है। यहां वर्ष भर बर्फ गिरती है।तापमान से नीचे वनस्पति सदाबहार शंक्वाकार है। धरातल ऊंचा-नीचा तथा तीव्र ढाल वाला होता है।
  2. उत्तरी पूर्वी पर्वतीय क्षेत्र -इसे (नास्ट इस्ट फ्रंटियर एरिया)भी कहते हैं। स्थलाकृति, ऊंचा नीचा, संकरी घाटियां, उष्ण आर्द्र जलवायु, शीतोष्ण से उसने जलवायु तापमान 0 डिग्री से 30 डिग्री सेंटीग्रेड पर वर्षण हिमपात से जल वर्षा सबसे अधिक वर्षा यही होती है। मासिनराव में वर्ष भर बादल छाए रहते हैं। वनस्पति अल्पाइन से उसने आद्र वनस्पति देवदार शीट आदि।
  3. नदीकृत मैदानी क्षेत्र – उत्तर के विशाल मैदान से पश्चिमी बंगाल तक समतल ढाल है। मानसूनी जलवायु तापमान 50 डिग्री से 470 डिग्री सेल्सियस तक जल वर्षा होती है। यहां पतझड़ वाले वन पाए जाते हैं।
पर्यावरण
  1. पठारी परिस्थिति क्षेत्र – प्रायद्वीपीय पठार उबड़-खाबड़ स्थलाकृति तक सामान्य से अधिक ढाल उच्चावच 50 से 500 मीटर सामान्य मानसूनी वनस्पति, मानसूनी शुष्क जलवायु पतझड़ वनस्पतियां होती हैं ।
  2. मरुस्थली परिस्थिति क्षेत्र – थार का मरुस्थल मुख्य क्षेत्र है बालू के स्तूप के साथ समतल मैदान पाए जाते हैं।
  3. अर्ध शुष्क परिस्थिति क्षेत्र – स्थलाकृति, सामान्य समतल मैदान, बालू प्रधान, मृदा जलवायु, आनंद शुष्क वनस्पति आदि।
  4. मृदाधंविध्यंन परिस्थिति क्षेत्र – उच्च पहाड़ी क्षेत्र, बुंदेलखंड क्षेत्र, स्थलाकृति, ऊंचा-नीचा जलवायु, आंध्र शुष्क झाड़ वाली वनस्पतियां
पर्यावरण भूगोलपर्यावरणपारिस्थितिकी
पारिस्थितिक तंत्रमृदा तंत्र विशेषताएं महत्व संघटकहरित गृह प्रभाव
ओजोन क्षरणपर्यावरण परिवर्तन के कारणमृदा अपरदन
पर्यावरण अवनयनभारत में वनोन्मूलनमरुस्थलीकरण
जल प्रदूषणवायु प्रदूषणमृदा प्रदूषण
बाघ परियोजनाजैव विविधता ह्रास के कारणभारत में जनसंख्या वृद्धि के कारण
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