पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986

पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 – यह अधिनियम पर्यावरण संरक्षण तथा उन्नयन एवं इससे सम्बन्धित तथ्यों का संरक्षण करता है। जून, 1972 में स्टाकहोम में मानवीय पर्यावरण को लेकर संयुक्त राष्ट्र संघ ने जो निर्णय लिये थे, उनमें भारत ने भी हिस्सा लिया एवं आश्वस्त किया कि मानवीय पर्यावरण के संरक्षण एवं सुधार के लिए यथासम्भव सभी प्रयास किये जायेंगे। इस बात पर भी विचार किया गया कि संयुक्त राष्ट्र महासभा के निर्णयों को लागू किया जाए तथा मानव जाति के लिए पर्यावरण संरक्षण ही नहीं अपितु वन्य जीवों, पौधों तथा सम्पत्ति की भी रक्षा की जाय।

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पर्यावरण संरक्षण अधिनियम

पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986

भारत सरकार द्वारा सन् 1980 में पर्यावरण मन्त्रालय को स्थापित किया गया। उल्लेखनीय है कि देश में औद्योगिक विकास, कृषि भूमि विस्तार, परिवहन सुविधाओं के प्रसार, खनन गतिविधियों के विस्तार तथा जनसंख्या वृद्धि के कारण पर्यावरण को अत्यधिक क्षति हो रही है। पर्यावरण ह्रास को रोकने के लिए तत्कालीन कानूनी प्रावधान अपर्याप्त लगे, अतः पर्यावरण प्रदूषण की रोकथाम तथा पर्यावरण को संरक्षण प्रदान करने के लिए पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 को लागू किया गया।

अधिनियम के उद्देश्य

छठवें दशक में विश्व में पर्यावरण के गिरते स्तर की ओर ध्यान आकर्षित हुआ तथा पर्यावरण के पतन का मुख्य कारण बढ़ता हुआ प्रदूषण सिद्ध हुआ। वनस्पति का ह्रास, जैविक प्रत्यावर्तन, वायु में हानिकारक रसायनों का बढ़ता हुआ सांद्रण, भोजन श्रंखला एवं पर्यावरणीय दुर्घटनाओं ने जीवन का आधार ध्वस्त करके भयभीत कर दिया।

अतः उपर्युक्त बातों को ध्यान में रखते हुए एक सामान्य कानून की नितान्त आवश्यकता पर्यावरण संरक्षण एवं समन्वय को लेकर अनुभूत हुई, जिसमें पर्यावरणीय गतिविधियों को लेकर नियमित पर्यावरण प्रदूषकों के विसर्जन एवं खतरनाक पदार्थों के उपयोग एवं पर्यावरणघाती दुर्घटनाओं तथा मानवीय पर्यावरण स्वास्थ्य एवं सुरक्षा से खिलवाड़ करने वालों के लिए विभिन्न सजाओं का प्रावधान करने पर विचार किया गया।

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पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986

पर्यावरण संरक्षण अधिनियम का महत्व

पर्यावरण के क्षेत्र में बढ़ते प्रदूषण को रोकने तथा प्रदूषण न होने देने के लिये भारत सरकार का यह एक समयानुकूल निम्न महत्त्वपूर्ण प्रयास है-

  • इस अधिनियम से जल-स्रोतों की तथा वायुमण्डल और भूमि की शुद्धता और निरापदता की रक्षा संभव है।
  • कठिन कानून तथा इसके नियमों में उल्लंघन के फलस्वरूप लगाये गये भारी आर्थिक दण्ड व कारावास की सजा से भी लोगों को एकाएक ऐसा कार्य करने का साहस न होगा, जिससे सामान्य नागरिकों का कोई नुकसान हो या नुकसान होने की संभावना हो।
  • दण्ड प्रक्रिया में उद्योग को चलाने वाले व्यवस्थापक को अथवा राज्य या केन्द्र सरकार के विभागों के विभागाध्यक्ष तक को ‘दोषी’ कटघरे में लाने का साहसिक कदम भी अत्यन्त सराहनीय एवं प्रशंसनीय है।

पर्यावरण संरक्षण अधिनियम के दोष

पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 की कुछ प्रमुख दोष निम्नलिखित हैं-

  • किसी भी उद्योग को प्रारम्भ करने से पूर्व इसके पर्यावरणीय प्रभाव के मूल्यांकन की व्यवस्था इस अधिनियम में नहीं है। इसके अभाव में भविष्य में कई आशंकाएँ संभव हैं।
  • देश के बढ़ते औद्योगीकरण के फलस्वरूप पर्यावरणीय प्रदूषण के मुकदमों की संख्या अनगिनत होगी। इन्हें सामान्य कोर्ट्स में, जहाँ पहले से ही हजारों मुकदमे अनिर्णीत हैं, सुलझाया जाना संभव नहीं है। इस अधिनियम में विशेष न्यायालयों के सम्बन्ध में कोई प्रावधान न होना, एक भारी कमी है।
  • इस अधिनियम की धारा 19 के तहत भारत के किसी भी नागरिक को किसी उद्योग द्वारा किये जा रहे जुर्म के सम्बन्ध में वाद दायर करने का अधिकार तो दिया गया है, लेकिन उसके साथ इतने प्रतिबन्ध हैं कि स्पष्टतः वह अपने को असहाय पाता है।
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