पर्यावरण शिक्षा

पर्यावरण शिक्षा वह शिक्षा है जो पर्यावरण के माध्यम से, पर्यावरण के विषय और पर्यावरण के लिए प्रदान की जाती है। यह शिक्षा व्यक्ति को पर्यावरण से अनुकूलन करना ही नहीं सिखाती बल्कि उसे पर्यावरण पर नियंत्रण रखने की क्षमता प्रदान करती है। पर्यावरण शिक्षा व्यक्ति को पर्यावरण समस्याओं से सम्बन्धित ज्ञान तथा मूल्यों के विकास द्वारा जीवन के लिये तैयार करती है। पर्यावरणीय शिक्षा एकीकृत, व्यावहारिक, लचीली, क्रिया आधारित स्थान तथा आवश्यकतानुसार होनी चाहिये।

मानव का पर्यावरण प्राकृतिक तथा मानव निर्मित एवं सुन्दर तथा शिक्षाप्रद है। जब बालक पशु-पक्षियों को देखकर उनकी ओर आकृष्ट होता है, तब उनके सम्बन्ध में परिचित कराना वातावरण के माध्यम से शिक्षा प्रदान करना है। यह शिक्षा कक्षा में दी गई शिक्षा से अधिक महत्त्वपूर्ण होते हैं। इसलिये पर्यावरण के माध्यम से व्यक्ति को शिक्षण अधिगम पर्याप्त मात्रा में प्रदान किया जाता है।

पर्यावरण के घटक
पर्यावरण शिक्षा

मानव अपने अस्तित्व और समवृद्धि के लिये प्रतिदिन पर्यावरण के सम्पर्क में कार्य करता है। वह किसी भी परिस्थिति में इससे बच नहीं सकता। वह परिवार में जन्म लेता है और उसी में उसका पालन-पोषण होता है। परिवार मनुष्य के लिये प्राथमिक समूह है। जब वह शैशवावस्था से बाल्यावस्था में आता है, तब वह पड़ोस, समुदाय आदि के सम्पर्क में आता है। वह इनके क्रिया कलापों में भाग लेता है। इस प्रकार वातावरण के बारे में जनता है।

पर्यावरण शिक्षा की परिभाषाएं

पर्यावरणीय शिक्षा की परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं

  1. जॉन ड्यूबी के शब्दों में- “समस्त शिक्षा व्यक्ति के द्वारा प्रजाति की सामाजिक चेतना में भाग लेने से प्रारम्भ होती हैं।”
  2. चेपमैन टेलर के शब्दों में “पर्यावरणीय शिक्षा सन्नागरिकता का विकास करती है। इससे अध्येता में पर्यावरण के सम्बन्ध में जानकारी, प्रेरणा और उत्तरदायित्व के भाव आते हैं।”
  3. श्री शुकदेव प्रसाद के शब्दों में—“पर्यावरण बड़ा व्यापक शब्द है। वस्तुतः इसका तात्पर्य उस समूची भौतिक एवं जैविक व्यवस्था से है, जिसमें जीवधारी रहते हैं, बढ़ते, पनपते हैं,और अपनी स्वाभाविक प्रवृत्तियों का विकास करते हैं।”
  4. टास सन के शब्दों में—“पर्यावरण ही शिक्षक है और शिक्षा का काम छात्र को उसके अनुकूल बनाना है।” उपरोक्त परिभाषाओं से यह निष्कर्ष निकलता है कि “पर्यावरणीय शिक्षा पर्यावरण के बारे में जानकारी कर अपने कौशल से उसकी समस्याओं को समझने, हल निकालने तथा मिटाने या दूर करने की शिक्षा है एवं वह सभी कार्य निष्पादन इस तरह किया जाना है कि उसकी पुनरावृत्ति न हो।”

पर्यावरणीय शिक्षा का क्षेत्र

पर्यावरणीय अध्ययन के अन्तर्गत भूगोल, इतिहास, नागरिकशास्त्र तथा अर्थशास्त्र का वह ज्ञान छात्र को मानवीय संबंधों एवं मानव समाज के सदस्य के रूप में अपना स्थान निश्चित करने के लिये आवश्यक है। यह पर्यावरण बालक के आयु वर्ग और शिक्षा-स्तर के अनुरूप निरन्तर विकसित होता है तथा पर्यावरण को समझने हेतु सम्बद्ध विषयों की विषय-वस्तु का भी विस्तार होता जायेगा। इस प्रकार पर्यावरणीय शिक्षा के क्षेत्र में पर्यावरण से संबंध इतिहास, भूगोल, नागरिकशास्त्र, समाज-शास्त्र तथा अर्थशास्त्र की शिक्षा उपयोगी रहती है।

पर्यावरण शिक्षा

इसकी सहायता से किसी क्षेत्र विशेष में उपस्थित बायोटा अर्थात् पादपजात एवं जन्तुजात की पहचान एवं गिनती की जाती है। इस विज्ञान की सहायता से विशिष्ट वातावरण, जैसे-वन, मृदा, समुद्र एवं प्राकृतिक समुदायों के अन्तर्सम्बन्धों का अध्ययन सम्भव होता है। कृषि, जीव, वैज्ञानिक सर्वे, कीट नियंत्रण, वानिकी एवं मत्स्य विज्ञान आदि क्षेत्रों में पारिस्थितिकी व्यावहारिक रूप से उपयोगी सिद्ध हुई है। मृदा संरक्षण, वन संरक्षण, वन्य जीव संरक्षण आदि कार्यों में यह विज्ञान अत्यधिक उपयोगी सिद्ध हुआ है। प्रदूषण के निराकरण एवं उससे बचाव के लिए भी हम पूर्ण रूप से पारिस्थितिकी के ज्ञान पर ही निर्भर हैं।

पर्यावरणीय शिक्षा का महत्व

जनसंख्या में हो रही तीव्र वृद्धि तीव्रता के साथ हो रहा औद्योगिक विकास, वन कटाव, यातायात वाहनों की संख्या में अत्यधिक वृद्धि तथा जनसाधारण की अज्ञानता तथा अशिक्षा के कारण आज पर्यावरण शिक्षा का महत्व दिनोदिन बढ़ता जा रहा है। पर्यावरणीय शिक्षा के बढ़ते हुए महत्व को निम्नलिखित बिन्दुओं द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है

  1. जनसाधारण में बढ़ती हुई निरक्षरता और अज्ञानता के कारण पर्यावरण सुरक्षा तथा संरक्षण के उपायों का भरपूर प्रयोग नहीं हो पा रहा है। अज्ञान तथा अशिक्षा से ग्रसित मनुष्य पर्यावरण की सुरक्षा नहीं कर सकता।
  2. पर्यावरण सुरक्षा के लिये पर्यावरण नियंत्रण भी आवश्यक है। जनसंख्या वृद्धि को कैसे रोका जाय वह पर्यावरण शिक्षा के क्षेत्र में आता है।
  3. वर्तमान में प्रत्येक देश में तीव्रगति से औद्योगीकरण हो रहा है। इससे पर्यावरण प्रदूषण की सम्भावनायें भी बढ़ती हैं। इनसे उत्पन्न प्रदूषण को रोकने व उसे नियन्त्रित करने के लिए पर्यावरण शिक्षा आवश्यक है।
  4. पर्यावरण शिक्षा हमारी संस्कृति की रक्षा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। अहिंसा, जीव दया, प्रकृति-पूजन आदि हमारी संस्कृति के मूलाधार हैं। पर्यावरण शिक्षा में इन तथ्यों की यथेष्ट मात्रा में शिक्षा दी जाती है।
  5. बढ़ते शहरीकरण तथा नगरों के बढ़ते आकार ने व्यक्तियों को प्रकृति से दूर कर दिया है। प्रकृति के जैविक एवं अजैविक तत्वों को समान रूप से प्रकृति के निकट जाने के लिये पर्यावरण शिक्षा आवश्यक है।

उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि पर्यावरण की शिक्षा आज की आवश्यकता है। हमें इसकी उपादेयता को स्वीकार करना चाहिए तथा इसके कार्यक्रमों की सफलता में अपना सक्रिय योगदान देना चाहिए। पर्यावरण शिक्षा अन्ततः हमें पर्यावरण की गुणवत्ता तथा जीवन की गुणवत्ता देने वाली है।

पर्यावरण शिक्षा आवश्यकता

पर्यावरण शिक्षा की आवश्यकता

एक ज्वलन्त प्रश्न है कि पर्यावरण की शिक्षा क्यों? क्या पूर्ववर्ती शिक्षा में पर्यावरण सम्मिलित नहीं था या उसकी आवश्यकता नहीं थी? वास्तव में पृथक् से पर्यावरण शिक्षा का दौर विगत 25 वर्षों में ही प्रारम्भ हुआ है और विगत दशक में यह अत्यधिक महत्त्वपूर्ण हो गया है। पर्यावरण शिक्षा का मूल उद्देश्य मानव-पर्यावरण के अन्तः सम्बन्धों की व्याख्या करना तथा उन सम्पूर्ण घटकों का विवेचन करना है जो पृथ्वी पर जीवन को परिचालित करते हैं, इसमें मात्र मानव जीवन ही नहीं अपितु जीव-जन्तु एवं वनस्पति भी सम्मिलित है।

मानव, तकनीकी विकास एवं पर्यावरण के अन्तः सम्बन्धों से जो पारिस्थितिकी चक्र बनाता है वह सम्पूर्ण क्रिया-कलापों और विकास को नियन्त्रित करता है। यदि इनमें सन्तुलन रहता है तो सब कुछ सामान्य गति से चलता रहता है, किन्तु किसी कारण से यदि इनमें व्यतिक्रम आता है तो पर्यावरण का स्वरूप विकृत होने लगता है और उसका हानिकारक प्रभाव न केवल जीव जगत अपितु पर्यावरण के घटकों पर भी होता है। वर्तमान में यह क्रम तीव्रता से हो रहा है।

औद्योगिक, तकनीकी, वैज्ञानिक, परिवहन विकास की होड़ में हम यह भूल गये थे कि ये साधन पर्यावरण को प्रदूषित कर मानव जाति एवं अन्य जीवों के लिए संकट का कारण बन जायेंगे। कुछ समय विचार विनिमय में बीतता गया, तर्क-वितर्क चलता रहा तथा पर्यावरण अवकर्षण में वृद्धि होती गई। वास्तविक चेतना का उदय तब हुआ जब विकसित देशों में यह संकट अधिक हो गया और उन्होंने इस दिशा में अपने प्रयासों को तेज कर दिया, राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय मंचों पर पर्यावरण चेतना एवं इसके खतरों की आवाज उठते लगी।

पर्यावरण शिक्षा का प्रारूप

इसी के साथ “पर्यावरण शिक्षा” का विचार भी बल पकड़ने लगा, क्योंकि इससे पूर्व पर्यावरण का विभिन्न विषयों में भिन्न-भिन्न परिवेशों में अध्ययन किया जाता था। अब यह सभी स्वीकार करते हैं कि पर्यावरण को शिक्षा का अभिन्न अंग बनाया जाना चाहिए जिससे छात्रों में प्रारम्भिक काल से ही पर्यावरण चेतना जाग्रत की जा सके। पर्यावरण शिक्षा की आवश्यकता निम्नांकित कारणों से है

  1. पर्यावरण के विभिन्न घटकों से परिचय कराना।
  2. पर्यावरण के घटक किस प्रकार एक-दूसरे से क्रियात्मक सम्बन्ध रखते हैं, इसकी समुचित जानकारी देना।
  3. पर्यावरण के विभिन्न घटकों का मानव के क्रिया-कलापों पर प्रभाव का ज्ञान प्रदान करना।
  4. पर्यावरण प्रदूषण के स्वरूप, कारण एवं प्रभावों का ज्ञान देना।
  5. पर्यावरण प्रदूषण के निवारण में व्यक्ति एवं समाज की भूमिका को उजागर करना।
  6. पर्यावरण एवं स्वास्थ्य के सम्बन्ध को स्पष्ट करना।
  7. पर्यावरण चेतना जगाना तथा पर्यावरण के प्रति अवबोध विकसित करना।
  8. पर्यावरण संरक्षण एवं प्रबन्धन हेतु साहित्य का सृजन करना।
  9. विभिन्न विषयों में पर्यावरण शोध की व्यवस्था करना।
  10. क्षेत्रीय पर्यावरणीय समस्याओं का अध्ययन एवं उनके निराकरण के उपाय प्रस्तुत करना, आदि।

संक्षेप में, पर्यावरण शिक्षा वह साधन है जिससे बाल्यकाल से ही पर्यावरण का सही ज्ञान दिया जा सकता है अर्थात् पर्यावरण के प्रति चेतना जगाई जा सकती है। इसके पश्चात् पर्यावरण की समस्याओं का ज्ञान एवं उनके निराकरण का ज्ञान दिया जाना आवश्यक है और इसके साथ ही शोध कार्य द्वारा इस दिशा में नवीन तकनीक का विकास किया जाना चाहिए। ये सभी कार्य पर्यावरण शिक्षा के माध्यम से सम्पन्न किये जा सकते हैं।

पर्यावरण शिक्षा
पर्यावरण शिक्षा

पर्यावरण शिक्षा का प्रारूप

पर्यावरण शिक्षा को प्रभावशाली बनाने इसकी विषय-वस्तु का चयन सावधानीपूर्वक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से करना आवश्यक है। इसके प्रारूप के निर्धारण में सैद्धान्तिक एवं व्यावहारिक पक्षों का सुनियोजित समावेश होना चाहिए तथा शिक्षा के स्तर के अनुरूप इनकी विषय-वस्तु में भी विकास आवश्यक है। 1981 में ‘पर्यावरण शिक्षा पर भारतीय पर्यावरण संस्था ने जो उनका सार निम्नांकित है सुझाव दिये

  1. पर्यावरण शिक्षा का स्वरूप पर्यावरण नीति के विकास में सहायक हो तथा मानव के प्राकृतिक वातावरण के प्रति सम्बन्धों का द्योतक हो। इसके अध्ययन से प्रत्येक व्यक्ति में यह भावना विकसित होनी चाहिए कि वह भी पर्यावरण का अभिन्न अंग है।
  2. माध्यमिक स्तर तथा विश्वविद्यालय स्तर पर पर्यावरण शिक्षा में समन्वय हो तथा उसके अध्ययन से छात्रों में पर्यावरणीय जागरुकता का विकास होना चाहिये।
  3. इसके द्वारा पर्यावरण की विभिन्न संकल्पनाओं तथा सिद्धान्तों का ज्ञान होना चाहिये।
  4. पर्यावरण शिक्षा हेतु वर्तमान में संलग्न अध्यापकों, डॉक्टरों, इंजीनियरों, नियोजकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, राजनीतिज्ञों, प्रशासकों का दिशा-निर्देश (री-ओरिएन्टेशन) कार्यक्रम प्रारम्भ किया जाए।
  5. विश्वविद्यालय स्तर पर छात्रों को मानव पर्यावरण के सम्बन्धों का अध्ययन कराया जाय तथा उनसे पर्यावरण के किसी पक्ष पर रिपोर्ट तैयार करवाई जाय।
  6. प्रत्येक स्तर पर विद्यार्थियों को पर्यावरणीय जागरुकता तथा प्रशिक्षण देना चाहिये।

उपर्युक्त निर्देश संकेत मात्र हैं, इनको पूर्णरूप से विकसित करने की आवश्यकता है। पर्यावरण शिक्षा का स्वरूप मूलतः भारतीय परिवेश में ही प्रस्तुत किया जा रहा है क्योंकि प्रत्येक देश की पारिस्थितियाँ भिन्न होती हैं, यद्यपि मूल स्वरूप समान ही होता है।

पर्यावरण शिक्षा

पर्यावरण शिक्षा किसी एक विषय से सम्बन्धित न होकर अन्तःविषयी विषय है। यह प्राकृतिक एवं सामाजिक विज्ञान दोनों में महत्त्व रखता है। इसका अध्ययन जहाँ जीव विज्ञान, भौतिकी, रसायन, अभियान्त्रिकी में होता है वहीं समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र, प्रजातीयविज्ञान, भूगोल आदि में भी महत्त्वपूर्ण है। पर्यावरण का भौगोलिक अध्ययन अति महत्त्वपूर्ण है क्योंकि भूगोल एक ऐसा विषय है जो प्रारम्भ से ही मानव-पर्यावरण के अन्तः सम्बन्धों का अध्ययन करता आया है और वर्तमान समय में पर्यावरण के विविध पक्षों का क्षेत्रीय विवेचन भूगोल की विषय-वस्तु का प्रमुख पक्ष है।

पर्यावरण शिक्षा का उद्देश्य

पर्यावरण शिक्षा के कुछ प्रमुख उद्देश्यों का वर्णन इस प्रकार है-

  1. उत्तम नागरिकता का विकास – उत्तम नागरिकों का निर्माण सामाजिक अध्ययन के माध्यम से ही सम्भव हो सकता है। इसलिए यही पर्यावरण शिक्षा का प्रमुख लक्ष्य माना गया है।
  2. सामाजिक भावनाओं का विकास – किसी भी देश के नागरिकों की समृद्धि वहाँ के जनसमुदाय की सामाजिक भावनाओं के विकास पर आधारित रहती है। पर्यावरण प्रदूषण की समस्या का समाधान छात्रों तथा जनता के मिले-जुले प्रयासों से ही किया जा सकता है, क्योंकिपर्यावरण शिक्षा के माध्यम से सच्ची सामाजिक भावनाओं का विकास होता है। इसलिये इसे दूसरा उद्देश्य अथवा लक्ष्य माना जाता है।
  3. वायु प्रदूषण की समस्याओं से परिचित कराना – पर्यावरण शिक्षा का उद्देश्य छात्रों को वायु प्रदूषण से उत्पन्न भयंकर समस्याओं से परिचित करना है, जिससे कि छात्र वायु को प्रदूषित होने से रोकने में अपना सक्रिय योगदान कर सकें और इसके आगामी खतरों से सचेत तथा सावधान रहें।
  4. जल प्रदूषण की समस्या – छात्रों को जल प्रदूषण के कारणों तथा समस्याओं से परिचित कराना चाहिये तथा इसके उपचार अर्थात् समाधान के उपाय बताने चाहिये, तभी वे इसके समाधान में योगदान कर सकते हैं।
  5. सामाजिक समस्याओं का ज्ञान तथा समाधान– पर्यावरण शिक्षा का उद्देश्य छात्रों को सामाजिक समस्याओं का ज्ञान कराना तथा उन समस्याओं का समाधान करने में सक्षम बनाना है।
  1. भू-प्रदूषण की समस्याओं से परिचित कराना– पर्यावरण शिक्षा का उद्देश्य छात्रों को भू-प्रदूषण की समस्याओं के कारणों तथा भयंकर प्रभावों से अवगत कराना है, जिससे कि वह जगह-जगह कूड़ा-करकट न डालें, क्योंकि इससे भू-प्रदूषण की समस्या जटिल रूप धारण कर लेती है। जगह-जगह थूकने तथा गन्दगी डालने से बदबू फैलती है। अनेक रोगाणुओं का जन्म होता है तथा प्रदूषण फैलता है। इसी प्रकार जगह-जगह मकान बनाने से भी भू-प्रदूषण होता है, क्योंकि सटे हुए मकान बनाने से प्रदूषण को रोकने हेतु वहाँ वृक्षारोपण के लिये खाली स्थान नहीं रह पाता है। इस प्रकार भू-प्रदूषण की समस्याओं का समाधान पर्यावरण शिक्षा के माध्यम से किया जा सकता है।
  2. ध्वनि प्रदूषण की समस्याओं से परिचित कराना- पर्यावरण शिक्षा का उद्देश्य छात्र को तेज ध्वनि करने वाले वाहनों, रेडियो, दूरदर्शन, स्टीरिये, टेपरिकार्डर आदि से होने वाली ध्वनि प्रदूषण के खतरों से परिचित कराना है, जिससे कि वे अपने पास-पड़ोस के वातावरण में होने के वाले ध्वनि प्रदूषण को रोक सकें तथा स्वयं भी इस प्रदूषण में हिस्सेदार बनने से बच सकें।
  3. पर्यावरण संरक्षण के लिए प्रेरित करना– पर्यावरण शिक्षा का उद्देश्य छात्रों को पर्यावरण-संरक्षण के लिये प्रेरित करना है। इसलिये छात्रों को राष्ट्रीय एवं स्थानीय स्तर पर पर्यावरण व वनों के संरक्षण के लिये बनाये गये नियमों का कड़ाई से पालन करने की शिक्षा प्रदान की जानी चाहिये, जिससे कि वनों का विनाश न हो सके और पर्यावरण का संरक्षण हो सके।
  4. जनसंख्या वृद्धि को रोकना–पर्यावरण शिक्षा का उद्देश्य छात्रों को बढ़ती हुई जनसंख्या के कुप्रभावों से परिचित करना है, क्योंकि इस वृद्धि को रोककर ही पर्यावरण को दूषित होने से बचाया जा सकता है। पर्यावरण शिक्षा बढ़ती हुई जनसंख्या को रोकने हेतु परिवार नियोजन व परिवार कल्याण आदि कार्यक्रमों को गति प्रदान करने का कार्य कर सकती है। इससे बढ़ती हुई जनसंख्या से उत्पन्न प्रदूषणों से परिचित होकर छात्र जनसंख्या वृद्धि रोकने में सहायता तथा योगदान प्रदान कर सकते हैं।
  5. राष्ट्रीय धरोहर के प्रति निष्ठा-पर्यावरण शिक्षा का उद्देश्य छात्रों में राष्ट्रीय धरोहर के प्रति निष्ठा, उनकी सुरक्षा तथा सम्मान की भावना का विकास करना भी है ताकि वे स्वाभिमान तथा स्वतंत्रता और निर्भयतापूर्वक जीवन व्यतीत कर सकें।

संक्षेप में कहा जा सकता है कि पर्यावरण शिक्षा का उद्देश्य मानव तथा प्रकृति के मध्य सीधे और आत्मीय संवाद की स्थिति बनाना, प्रदूषण के प्रति समझ उत्पन्न कर पर्यावरण को संरक्षित करना, विकास तथा पर्यावरण के मध्य ऐसा समीकरण बनाना जो विनाश से बचा सके। पर्यावरणीय समस्याओं का समाधान करने में भागीदारी करने की दृष्टि, कौशल और योग्यता का विकास करना तथा पर्यावरण और विश्व के अभिन्न भाग होने की भावना का विकास करना आदि मुख्य है।

Environment education

पर्यावरण शिक्षा की विशेषताएं

पर्यावरण शिक्षा की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं—

  1. पर्यावरण शिक्षा से ज्ञान कौशल, बौद्धिक विकास, अभिवृत्तियों एवं मूल्यों का विकास जीवन में रचनात्मक कार्यों के लिये किया जाता है, जिससे जीवन उत्तम बनाया जा सके।
  2. पर्यावरण शिक्षा द्वारा बालक को स्वयं प्राकृतिक तथा जैविक वातावरण की समस्याओं को खोजने में समर्थ बनाया जाता है, एवं उसका समाधान स्वयं करता है जिससे जीवन का विकास होता है।
  3. इसमें शिक्षा के विभिन्न आयामों, विधियों, प्रविधियों को प्रस्तुत किया जाता है। वास्तविक समस्या के कारण प्रभाव को पहिचानना एवं औपचारिक अनौपचारिक शिक्षा द्वारा समस्याओं का समाधान करना जिससे मनुष्य में गुणवत्ता लायी जा सके।
  4. इसका सम्बन्ध पर्यावरण के सैद्धान्तिक एवं व्यावहारिक दोनों पक्षों से होता है, जिससे पर्यावरण प्रदूषण को रोका जा सके तथा असंतुलन को दूर किया जा सके।
  1. यह एक प्रक्रिया है जो मनुष्य को उसके सांस्कृतिक तथा जैविक वातावरण के पारस्परिक सम्बन्धों का बोध कराती है।
  2. इसमें पर्यावरण के संतुलन की पहचान की जाती है एवं अपेक्षित विकास तथा सुधार का प्रयत्न किया जाता है।
  3. पर्यावरण शिक्षा में भौतिक, जैविक, सांस्कृतिक एवं मनोवैज्ञानिक, पर्यावरण का ज्ञान और जानकारी की जाती है तथा वास्तविक जीवन में उसकी सार्थकता को समझने का प्रयत्न किया जाता है।
  4. पर्यावरण शिक्षा समस्या केन्द्रित, अन्तः अनुशासन आयाम, मूल्य एवं समुदाय का अभिविन्यास, भविष्य की तरफ उन्मुख मानव विकास और जीवन से सम्बन्धित है। इसका सम्बन्ध भविष्य से होता है।
  5. इसमें पर्यावरण की गुणवत्ता हेतु निर्णय लिया जाता है, अभ्यास किया जाता है, जिससे कि समस्याओं का समाधान किया जा सके।
पर्यावरण शिक्षा की विशेषताएं
पर्यावरणपर्यावरण शिक्षापर्यावरण परिवर्तन के कारण
पर्यावरण अवनयनपर्यावरण संबंधी कानूनपर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986
पारिस्थितिक पिरामिडजलवायु परिवर्तनप्राथमिक स्तर पर पर्यावरण शिक्षा
माध्यमिक स्तर पर पर्यावरण शिक्षाविश्वविद्यालय स्तर पर पर्यावरण शिक्षा
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