परिवार

मानव सभ्यता के सम्पूर्ण इतिहास में परिवार का महत्व सबसे अधिक रहा है। व्यक्ति परिवार में जन्म लेता है तथा परिवार में ही उन सभी नियमों और व्यवहारों को सीखता है, जो उसे सच्चे अर्थों में एक सामाजिक प्राणी बनाते हैं। कोई समाज चाहे परम्परागत हो अथवा आधुनिक, ग्रामीण हो या नगरीय, धनी हो या निर्धन, परिवार सभी समुदायों की एक सार्वभौमिक विशेषता है। इसके बाद भी विभिन्न समुदायों में परिवार की प्रकृति समान नहीं होती।

परम्परागत और कृषिप्रधान समाजों में अनेक पीढ़ियों के लोग साथ-साथ रहकर बड़े परिवारों की स्थापना करते हैं। इन्हें हम संयुक्त अथवा विस्तृत परिवार कहते हैं। आधुनिक जटिल और बड़े समाजों में परिवार का आकार तुलनात्मक रूप से बहुत छोटा होता है। प्रायः एक परिवार में केवल पति-पत्नी और उनके अविवाहित बच्चे ही रहते हैं। ऐसे परिवारों को ‘मूल परिवार’ अथवा ‘एकाकी परिवार’ कहा जाता है।

यह ध्यान रखना जरूरी है कि प्रत्येक परिवार में व्यवहार करने और सम्बन्ध स्थापित करने के कुछ निश्चित नियम होते हैं। इस दृष्टिकोण से परिवार एक संस्था है। दूसरी ओर परिवार में कुछ व्यक्ति साथ-साथ निवास करते हैं तथा कुछ विशेष उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए मिल-जुलकर कार्य करते हैं। इस आधार पर परिवार को एक समूह या समिति भी कहा जा सकता है।

परिवार को चाहे एक संस्था कहा जाए अथवा समिति, हममें से कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं होता, जो किसी-न-किसी परिवार का सदस्य न हो। एण्डरसन (Anderson) ने इस आधार पर दो प्रकार के परिवारों का उल्लेख किया है— जन्म का परिवार तथा जन्म देने का परिवार। इसका तात्पर्य है कि जो व्यक्ति अविवाहित रहने के कारण अपने एक पृथक् परिवार की स्थापना नहीं कर पाते, वे भी एक ऐसे परिवार के सदस्य अवश्य होते हैं, जिसमें उन्होंने जन्म लिया हो।

परिवार की परिभाषा

विभिन्न समाजशास्त्रियों ने परिवार को इसके आकार, ऐतिहासिकता तथा कार्यों के आधार पर भिन्न-भिन्न रूप से परिभाषित किया है। एक ओर मॉर्गन, हॉवहाउस तथा वैस्टरमार्क ने परिवार के ऐतिहासिक विकास क्रम पर प्रकाश डाला, जबकि दूसरी ओर, ऑगवर्न, डेविस, मैकाइवर आदि ने परिवार की विवेचना इसके प्रकार्यों के आधार पर की है।

परिवार है, जन-सम् पर आश्रित है तथा सन्तान के जन्म और पालन-पोषण की व्यवस्था करता है।

मैकलेवर तथा पेज के अनुसार

परिवार बच्चों अथवा बिना बच्चों वाले पति-पत्नी अथवा किसी पुरुष अथवा स्त्री में से एक के साथ रहने वाली संतानों की एक स्थायी समिति है।

ऑगबर्न तथा निमकॉफ

परिवार ऐसे व्यक्तियों का समूह है, जो विवाह, रक्त अथवा गोद लेने के सम्बन्धों द्वारा संगठित होता है, एक छोटी-सी गृहस्थी का निर्माण करता है तथा एक सामान्य संस्कृति के अन्तर्गत सदस्यों की देखरेख करता है।

बर्गेस और लॉक

परिवार के तत्व

इन सभी परिभाषाओं से परिवार के अनेक तत्वों पर प्रकाश पड़ता है-

  1. परिवार एक छोटा निश्चित प्रकृति का तथा शक्तिशाली समूह है।
  2. परिवार का निर्माण उन व्यक्तियों के द्वारा होता है, जिनके दी पति-पत्नी, माता-पिता, पुत्र-पुत्री अथवा भाई बहिन के सम्बन्ध होते हैं।
  3. यह वह समूह है, जिसमें बच्चों के जन्म और पालन-पोषण की व्यवस्था होती है।
  4. परिवार का आकार छोटा और बड़ा दोनों प्रकार का हो सकता है, लेकिन वर्तमान औद्योगिक युग में अधिकांश परिवार छोटे आकार के पाए जाते हैं।
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परिवार की प्रमुख विशेषताएं

मैकाइवर और पेज तथा किंग्सले डेविस ने परिवार की प्रकृति को अनेक विशेषताओं के आधार पर स्पष्ट किया है। इसमें से कुछ प्रमुख विशेषताएं निम्न प्रकार हैं-

  1. सार्वभौमिकता सभी संस्थाओं और समितियों में परिवार सबसे अधिक सार्वभौमिक है। यह सभी आदिम और सभ्य समाजों में पाया जाता है। परिवार की सार्वभौमिकता का कारण यह है कि यह व्यक्ति की उन आवश्यकताओं को पूरा करता है, जिन्हें किसी भी दूसरे समूह द्वारा नहीं किया जा सकता।
  2. भावनात्मक आघार–परिवार का एक महत्वपूर्ण लक्षण सभी सदस्यों द्वारा मिल-जुलकर काम करना और एक-दूसरे के हित में अपना हित देखना है। परिवार में पालन-पोषण की व्यवस्था, त्याग, सहानुभूति और स्नेह आदि कुछ ऐसी विशेषताएं हैं, जिनके कारण सभी सदस्य एक-दूसरे से मानसिक रूप से बंधे रहते हैं।
  3. रचनात्मक प्रभाव – परिवार में सभी सदस्य अपने व्यवहारों के द्वारा एक-दूसरे को रचनात्मक रूप से प्रभावित करते हैं। यही रचनात्मक कार्य सदस्यों का समाजीकरण करते हैं, उनके व्यवहारों पर नियन्त्रण ” रखते हैं तथा पारस्परिक सहयोग को बढ़ाते हैं।
  4. छोटा आकार परिवार के सदस्य केवल वे व्यक्ति ही होते हैं, जिन्होंने इसमें जन्म लिया हो अथवा विवाह सम्बन्ध स्थापित किए हों। अपने सीमित आकार के कारण ही परिवार की प्रकृति सदैव कल्याणकारी होती है।
  5. सदस्यों का असीमित दायित्व — परिवार में किसी भी सदस्य के दायित्वों की कोई निश्चित सीमा नहीं होती। इसमें व्यक्ति अपनी क्षमता और कुशलता के अनुसार वे सभी कार्य करता है, जो दूसरे सभी सदस्यों के लिए उपयोगी होते हैं।
  6. परम्पराओं की प्रधानता – परिवार एक ऐसा समूह है, जो अनेक सांस्कृतिक और परम्परागत नियमों पर आधारित होता है। परम्पराएं और सांस्कृतिक नियम ही वंश-नाम, उत्तराधिकार तथा धार्मिक विधि-विधानों की प्रकृति को निर्धारित करते हैं।
  7. सामाजिक ढांचे में केन्द्रीय स्थिति सम्पूर्ण सामाजिक संरचना में परिवार का महत्व केन्द्रीय है। इसका तात्पर्य यह है कि परिवार की प्रकृति में परिवर्तन होने के साथ ही सामाजिक संरचना में भी परिवर्तन के तत्व स्पष्ट होने लगते हैं। इसी कारण, सामाजिक संगठन के लिए पारिवारिक संगठन को सबसे अधिक आवश्यक समझा जाता है।
  8. परिवार की स्थायी व अस्थायी प्रकृति – परिवार का एक मौलिक लक्षण यह है कि परिवार एक समिति भी है और संस्था भी। यदि परिवार को पति-पत्नी और उनकी सन्तानों के समूह के रूप में देखा जाए, तब परिवार एक समिति है। दूसरी ओर, परिवार को नियमों की एक व्यवस्था के रूप में देखने पर इसे एक संस्था कहा जाएगा। समिति के रूप में परिवार की प्रकृति अस्थायी होती है, जबकि संस्था के रूप में यह बहुत स्थायी है।

परिवार के प्रकार

समाजशास्त्रियों ने विभिन्न आधारों पर परिवार के अनेक रूपों का उल्लेख किया है। इनमें आकार तथा सदस्यों के पारस्परिक सम्बन्धों के आधार पर परिवार के चार प्रकारों को अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है।

  1. केन्द्रक परिवार
  2. संयुक्त परिवार
  3. विस्तृत परिवार
  4. मिश्रित परिवार

1. केन्द्रक परिवार

वर्तमान युग में ऐसे परिवारों की संख्या सबसे अधिक है। केन्द्रक, नाभिक अथवा मूल परिवार औद्योगीकरण तथा नगरीकरण की देन है, जिनमें पति-पत्नी केवल अपने अविवाहित बच्चों के साथ रहते हैं। ऐसे परिवारों का संगठन बहुत सरल प्रकृति का होता है। आकार की दृष्टि से ये परिवार बहुत छोटे होते हैं। साधारणतया इनकी सदस्य संख्या 5-6 तक सीमित रहती है।

जैसे ही किसी बच्चे के वयस्क बन जाने पर उसका विवाह होता है, वह एक पृथक् एकाकी परिवार की स्थापना कर लेता है। इन परिवारों को तात्कालिक ( immediate) तथा प्राथमिक (primary) परिवार भी कहा जाता है। यह परिवार तात्कालिक इस कारण है कि इसके सदस्य केवल वही व्यक्ति हो सकते हैं, जिन्होंने इसमें जन्म लिया हो अथवा जो पति-पत्नी द्वारा गोद लिए गए हों। इनका महत्व प्राथमिक होने के कारण इन्हें प्राथमिक परिवार भी माना जाता है।

2. संयुक्त परिवार

संयुक्त परिवार भारतीय समाज की एक प्रमुख विशेषता है। जब किसी परिवार में तीन-चार या इससे भी अधिक पीढ़ियों के रक्त सम्बन्धी, उनकी पत्नियां तथा विवाहित और अविवाहित बच्चे किसी वयोवृद्ध व्यक्ति के निर्देशन में रहते हों, तब ऐसे परिवार को संयुक्त परिवार कहा जाता है। इन परिवारों में सभी सदस्य एक ही रसोई में बना भोजन करते हैं, अपनी आय को एक सामान्य कोप में रखते हैं और सामान्यतया आनुवंशिक व्यवसाय करते हैं।

इस प्रकार, संयुक्त परिवार की एक प्रमुख विशेषता इसकी समाजवादी प्रकृति है। दूसरे शब्दों में, परिवार का कोई सदस्य चाहे कितना ही कम अथवा अधिक धनोपार्जन क्यों न करे, लेकिन सभी सदस्यों को उनकी आवश्यकतानुसार व्यय करने की ही अनुमति दी जाती है। स्वाभाविक है कि ऐसे परिवारों का आकार अथवा सदस्य संख्या काफी अधिक होती है।

3. विस्तृत परिवार

विभिन्न समाजों में विस्तृत परिवारों की प्रकृति एक-दूसरे से भिन्न देखने को मिलती है। साधारणतया पश्चिमी समाजों में एक ऐसा परिवार, जिसमें वृद्ध व्यक्ति, कुछ उसकी पत्नी, उनके पुत्र तथा उनकी पलियां और बच्चे साथ-साथ रहते हों, उसे विस्तृत परिवार कहा जाता है। इसका अर्थ है कि एक ही माता-पिता से सम्बन्धित तीन पीढ़ियों के सदस्य एक विस्तृत परिवार का निर्माण करते हैं।

यदि किसी परिवार में एक पति-पत्नी के माता-पिता तथा सन्तानों के अतिरिक्त उनके सास-श्वसुर अथवा साले या साली में से भी कोई रहने लगता है, तब इसे भी विस्तृत परिवार कहा जाता है। इस प्रकार, विस्तृत परिवार दो-तीन केन्द्रीय परिवारों का एक संकुल होता है। दक्षिण भारत के नायरों में विस्तृत परिवार का यही रूप देखने को मिलता है, जिसे ‘तारवाड़’ कहा जाता है।

4. मिश्रित परिवार

ये परिवार ये हैं, जिनमें केन्द्रीय तथा संयुक्त परिवार की विशेषताओं का मिश्रित रूप देखने को मिलता है। इनका संगठन तथा आकार मध्यम स्तर का होता है। वास्तविकता यह है कि जिन समाजों में औद्योगीकरण तथा नगरीकरण के कारण संयुक्त परिवारों का विघटन हो रहा है, वहां व्यक्ति अपने एकाकी परिवारों की स्थापना कर लेने के बाद भी मानसिक रूप से संयुक्त परिवारों की परम्परा से बंधे हुए हैं।

इसके फलस्वरूप ये परिवार आर्थिक रूप से स्वतन्त्र होने के बाद भी नातेदारी, सांस्कृतिक समारोहों और धार्मिक अनुष्ठानों में संयुक्त रूप से ही हिस्सा लेते हैं। अक्सर विवाहित पुत्र भी कुछ अवधि तक अपने माता-पिता के साथ ही निवास करते हैं, यद्यपि आर्थिक दायित्व बढ़ जाने के बाद वे पुनः अपना एक पृथक् एकाकी परिवार स्थापित कर लेते हैं। इस प्रकार, मिश्रित परिवार आर्थिक स्तर पर एकाकी परिवारों के समान और मानसिक स्तर पर संयुक्त परिवारों के समान होते हैं।

परिवार के कार्य

सभी समूहों और संस्थाओं में परिवार का महत्व सबसे अधिक इसलिए है कि परिवार अपने सदस्यों के लिए वे सभी कार्य करता है, जो उनके अस्तित्व, व्यक्तित्व के विकास तथा सामाजिक नियंत्रण आवश्यक हैं। इस सम्बन्ध में बीरस्टीड (R. Bierstedt ) ने परिवार के दस प्रमुख कार्यों का उल्लेख किया है—

  1. बच्चों को जन्म देना
  2. यौन सम्बन्धों पर नियन्त्रण रखना
  3. सदस्यों की देखरेख करना
  4. सांस्कृतिक विशेषताएं सिखाना
  5. समाज में एकरूपता उत्पन्न करना
  6. सदस्यों के जीवन की रक्षा करना
  7. पारस्परिक सहयोग को बढ़ाना
  8. सदस्यों का समाजीकरण करना
  9. सदस्यों को एक विशेष सामाजिक स्थिति देना
  10. आर्थिक क्रियाएं करना।

परिवार के महत्व

स्पष्ट है कि यौनिक इच्छा की सन्तुष्टि, सन्तानोत्पत्ति तथा सामाजिक सुरक्षा परिवार के वह महत्वपूर्ण कार्य हैं, जिन्हें किसी भी दूसरे समूह द्वारा नहीं किया जा सकता है। सामाजिक नियंत्रण में परिवार के महत्व को इसके कुछ प्रमुख कार्यों के द्वारा निम्नांकित रूप से समझा जा सकता है-

  1. जैविकीय कार्य — एक जैविकीय प्राणी के रूप में मनुष्य में अनेक ऐसी जन्मजात इच्छाएं होती हैं, जिनकी नियमानुसार पूर्ति होना आवश्यक है। इस सम्बन्ध में परिवार अपने चार कार्यों के द्वारा व्यक्ति की इन इच्छाओं को पूरा करता है—
    • सर्वप्रथम, परिवार एकमात्र ऐसी संस्था है, जो विवाहित सदस्यों को कुछ नियमों के अन्तर्गत यौनिक सन्तुष्टि के अवसर देती है।
    • सभी पुरुषों में पिता बनने और स्त्रियों में मां बनने की प्रबल इच्छा होती है। इसे मातृमूलक प्रवृत्ति कहा जाता है। परिवार अपने सदस्यों को सन्तानोत्पत्ति की सुविधाएं देकर इस प्रवृत्ति को सन्तुष्ट करता है।
    • अपने सदस्यों की अनिवार्य आवश्यकताओं को पूरा करके परिवार उन्हें शारीरिक सुरक्षा प्रदान करता है।
    • दुर्घटना, बीमारी और बेकारी जैसी दशाओं में व्यक्ति को शारीरिक और मानसिक सुरक्षा प्रदान करना भी परिवार का एक प्रमुख कार्य है। यही वे कार्य हैं, जिनसे व्यक्ति अपने व्यक्तित्व को सन्तुलित रूप से विकसित करता है।
  2. समाजीकरण का कार्य परिवार ही व्यक्ति को एक जैविकीय प्राणी से सामाजिक प्राणी बनाता है।
    • परिवार का कार्य व्यक्ति को जीवन के आरम्भ से अन्त तक अपने समाज और संस्कृति का प्रशिक्षण देकर उसे समाज का एक उपयोगी सदस्य बनाना है।
    • परिवार प्रत्येक व्यक्ति को एक विशेष सामाजिक प्रस्थिति और भूमिका देता है, जिससे पारस्परिक संघर्षों की सम्भावना को कम-से-कम किया जा सके।
    • परिवार एक अनौपचारिक संस्था है, जो प्रशंसा, पुरस्कार, सहानुभूति, त्याग अथवा आलोचना के द्वारा अपने सदस्यों के व्यवहारों पर नियन्त्रण रखती है।
    • परिवार द्वारा किए जाने वाले शैक्षणिक कार्य भी बहुत महत्वपूर्ण हैं। इसी आधार पर अरस्तू ने परिवार को ‘जीवन की प्रारम्भिक पाठशाला’ के नाम से सम्बोधित किया था। समाजीकरण के इन कार्यों के आधार पर बर्गेस और लॉक का कथन है कि “परिवार व्यक्ति को एक सांस्कृतिक प्राणी बनाने वाली महत्वपूर्ण संस्था है।
  3. आर्थिक कार्य — सभी परिवार कुछ प्रमुख आर्थिक क्रियाओं के केन्द्र रहे हैं। असभ्यता के स्तर में भी परिवार का कार्य श्रम विभाजन के द्वारा व्यक्ति की आर्थिक आवश्यकताओं को पूरा करना था। उस समय भी परिवार के पुरुष सदस्य जंगल में शिकार करने और भोजन की खोज में चले जाते थे, जबकि स्त्रियां खेती, पशुपालन और दूसरे कार्यों को करती थीं। इस प्रकार
    • सदस्यों के बीच श्रम-विभाजन करना परिवार का एक प्रमुख कार्य रहा है।
    • कुटीर उद्योगों के विकास में भी परिवार का प्रमुख योगदान रहा है।
    • परिवार अपने सदस्यों के लिए उत्तराधिकार की समुचित व्यवस्था करता है, जिससे सभी सदस्यों को सम्पत्ति में उचित हिस्सा मिल सके।
    • सम्पत्ति की व्यवस्था करने तथा विपत्ति के समय सदस्यों को सुरक्षा प्रदान करने के लिए सम्पत्ति के एक भाग को सुरक्षित रखने का कार्य भी परिवार द्वारा किया जाता रहा है।
  4. सांस्कृतिक कार्य — इस क्षेत्र में परिवार अपने सदस्यों के लिए तीन महत्वपूर्ण सेवाएं प्रदान करता है –
    • सर्वप्रथम परिवार अपने सदस्यों को विभिन्न प्रथाओं, परम्पराओं, जनरीतियों, लोकाचारों और धार्मिक नियमों की शिक्षा देकर उन्हें अपने समाज की संस्कृति के अनुसार व्यवहार करने की प्रेरणा देता है।
    • परिवार अपने सदस्यों का मानवीकरण करता है। इसके लिए सदस्यों में त्याग, सहिष्णुता, कर्तव्य-पूर्ति, इमानदारी, अनुशासन और परिश्रम जैसे गुणों को विकसित करना परिवार का ही कार्य है।
    • परिवार ही व्यक्ति में ऐसी मनोवृत्तियां, विचार और भावनाएं विकसित करता है, जो एक विशेष संस्कृति के मूल्यों के अनुरूप होती है। इन्हीं कार्यों के आधार पर परिवार को एक सांस्कृतिक और नैतिक संस्था भी कहा जाता है।
  5. धार्मिक कार्य — धार्मिक क्रियाओं पर सदैव से परिवार का एकाधिकार रहा है।
    • परिवार अपने सदस्यों को धार्मिक नियमों के अनुसार आचरण करना, धार्मिक क्रियाओं में भाग लेना तथा नैतिक और अनैतिक कार्यों के बीच भेद करना सिखाता है।
    • परिवार ही सबसे पहले बच्चे के मन से ईश्वर और पवित्रता सम्बन्धी विचार उत्पन्न करता है, जो व्यक्तित्व के विकास में बहुत सहायक सिद्ध है।
    • परिवार व्यक्ति के जीवन में धर्म के महत्व को स्पष्ट करके अपने सदस्यों को सदाचार और अतिकता की ओर ले जाता है।
  6. राजनीतिक कार्य—कन्फ्यूशियस ने लिखा है कि “मनुष्य सबसे पहले अपने परिवार का सदस्य है और फिर राज्य का क्योंकि राज्य का स्वरूप परिवारों के रूप पर ही आधारित होता है।”
    • परिवार राज्य के समान ही अपने सदस्यों के व्यवहारों पर नियन्त्रण लगाता है।
    • परिवार अपने इन सदस्यों को दण्ड देता है, जो सामाजिक और सांस्कृतिक नियमों की अवहेलना करते हैं।
    • परिवार अपने सदस्यों को उनकी योग्यता और कुशलता के अनुसार विभिन्न भूमिकाएं और अधिकार प्रदान करता है।
    • सदस्यों के पारस्परिक विवादों का निपटारा करना तथा विभिन्न स्थितियों में न्यायपूर्ण निर्णय देना परिवार का ही कार्य है। इस तरह, सदस्यों को अनुशासित नागरिक बनाने में परिवार की एक महत्वपूर्ण भूमिका है।
  7. मनोरंजन सम्बन्धी कार्य परिवार सदैव से ही अपने सदस्यों को स्वस्थ मनोरंजन देने का कार्य करते रहे हैं। परिवार द्वारा दिया जाने वाला मनोरंजन छोटी-छोटी कहानियों, लोक-गाथाओं, पौराणिक कथाओं, नाच-कूद, हंसी-मजाक आदि के रूप में होता है। अनेक उत्सवों, त्योहारों और संस्कारों का आयोजन करके मी परिवार अपने सदस्यों का मनोरंजन करता है। ऐसे मनोरंजन का अन्तिम उद्देश्य व्यक्ति के चरित्र का निर्माण करना होता है।

परिवार के इन सभी कार्यों के महत्व को स्पष्ट करते हुए गोल्डस्टीन का कथन है कि “परिवार वह स्थान है, जिसमें भविष्य का जन्म होता है और ऐसा शिशु गृह है, जिसमें एक लोकतान्त्रिक सामाजिक व्यवस्था का निर्माण होता है। परम्परा के द्वारा परिवार अतीत से सम्बन्धित है, लेकिन सामाजिक और विश्वास के आधार पर परिवार का सम्बन्ध भविष्य से भी है।” यही दशाएं सामाजिक नियंत्रण का आधार हैं।

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