नीति आयोग

दसवीं पंचवर्षीय योजना 2002-07 में पहली बार एन. डी ए सरकार में एक दस्तावेज में यह आह्वान किया गया कि यदि राज्य विकसित हो तो देश भी विकसित होगा। हम विकेन्द्रित नियोजन की ओर एक परिवर्तन देखते हैं। योजना को लोक योजना कहकर पुकारा जाता था। इसी योजनावधि में आया था जिसमे राज्यों को नियोजित विकास की प्रक्रिया में अधिक भागीदारी तथा जिम्मेदारी प्रदान की गई थी। इसी योजना अवधि में कुछ और कदम भी उठाए गए जिससे कि विकास प्रक्रिया में राज्य अधिकाधिक शामिल हो ।

नीति आयोग का अर्थ

नीति आयोग का अर्थ है- भारत के रुपान्तरण हेतु राष्ट्रीय संस्था (National Institute for Transforming India), वर्ष 2014 के मध्य में केन्द्र में एक मजबूत और स्थिर सरकार बनी। नई सरकार में कई क्षेत्रों में नई ऊर्जा और उत्साह का वातावरण बना दश में वृद्धि एवं विकास को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से संघीय ढाँचे को पुनर्परिभाषित करने का प्रयास किया गया है।

राज्यों को मजबूत बनाने और आगे करने की दिशा में नीतिगत परिवर्तन किये जा रहे हैं जिससे कि उन्हें अधिक वित्तीय उत्तरदायित्व दिये जा सके और उनका वित्तीय क्षेत्र भी बढ़ाया जा सके। इस दिशा में अपने वायदो पर कायम रहते हुए भारत सरकार ने योजना आयोग को समाप्त करके नीति आयोग की स्थापना की है।

Full FormNational Institution for Transforming India
HeadquartersNew Delhi
JurisdictionGovernment of India
Formed1 January 2015
WebsiteClick here

नीति आयोग की आवश्यकता

भारत सरकार नीति आयोग की सहायता से भारत के विकास के एजेंडा को रूपांतरित करना चाहती है और उसमें योजना से नीति की ओर का आह्वान कर रही है। भारत में पिछले दशकों में राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक प्रौद्योगिक तथा जनसांख्यिकी रूप से भारी नीतिगत परिवर्तन हुए हैं। सरकार की भूमिका भी राष्ट्रीय विकास के लिए उसी प्रकार समानांतर रूप से विकसित होती रही है।

बदलते समय के साथ समायोजन के लिए सरकार ने नीति आयोग को भारत के लोगों की जरूरतों एवं आकांक्षाओं को पूर्ण करने के लिए साधन के रूप में स्थापित किया है। सरकार का विचार है कि नीति आयोग विकास प्रक्रिया में प्रेरक का कार्य करेगी तथा विकास के प्रति एक समग्र दृष्टिकोण रखते हुए इसे सार्वजनिक क्षेत्र एवं भारत सरकार की सीमित परिधि से बाहर जाकर अनुकूल वातावरण का निर्माण करेगी।

  1. नीति आयोग राज्यों को राष्ट्रीय विकास में बराबर का भागीदार बनाकर उनकी भूमिका को शक्तिशाली बनायेगा और इस प्रकार सहकारी संघवाद के सिद्धान्त को कार्य व्यवहार में लाया जायेगा।
  2. आतंरिक एवं बाह्य संसाधनों का एक ज्ञान केन्द्र होगा जहाँ कि सुशासन स्थापित रहे, साथ ही एक थिंक टैंक के रूप में जो सरकार के सभी स्तरों पर अपनी रणनीतिक विशेषज्ञता उपलब्ध कराये।
  3. नीति आयोग एक ऐसा सहयोग मंच है जहाँ कि प्रगति, अंतरों को दूर करने तथा केन्द्र एवं राज्य के मंत्रालयों को विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने के संयुक्त उद्यम में एक जगह लाकर कार्यान्वयन के एक सहयोगी मंच के रूप में कार्य किया जाता है। नीति आयोग की आवश्यकता के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं-
    1. देश की जनसंख्या बढ़कर 121 करोड़ तक पहुँच गई है। शहरी जनसंख्या में जुड़ी 30 करोड़ की आबादी शामिल है। 35 वर्ष से कम उम्र के 55 करोड़ युवा जनसंख्या के हिस्सा है। अर्थव्यवस्था विकास साक्षरता एवं संचार के बढ़ते स्तर के साथ लोगों की इच्छाओं कमियों व अस्तित्व के स्तर से आगे बढ़कर सुरक्षा व अधिशेष तक जा पहुंची है। आज का भारत बदला हुआ भारत है और भारत की शासन व्यवस्था को इस बदले हुए भारत की जरूरतों के अनुरूप बदलना है।
    2. देश की अर्थव्यवस्था में भी भारी बदलाव आया है। इसका सौ गुणा विस्तार हुआ है। सकल घरेलू उत्पाद 1000 करोड़ रुपये से शुरू होकर और 100 लाख करोड़ रुपये तक पहुँच गया है। आज यह विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। भारत के सकल घरेलू उत्पाद में कृषि के हिस्से में भी भारी गिरावट आई है। पहली योजना के 2400 करोड़ रुपये के योजना आकार से बढ़कर 12वीं योजना का योजना का आकार 43 लाख करोड़ रुपये का है। प्राथमिकताएँ, रणनीतियों एवं संरचनाएँ जो योजना आयोग के जन्म के समय में चली आ रही है। वे अब बदलनी चाहिए। इस व्यापक परिवर्तन के परिप्रेक्ष्य में भारत में योजना प्रक्रिया की प्रकृति को ही बदलने की जरूरत हुई।
  1. भारतीय अर्थव्यवस्था की प्रकृति तथा इसमें सरकार की भूमिका में भारी परिवर्तन आया। उदारीकृत अर्थव्यवस्था में निजी क्षेत्र की एक अत्यन्त जीवंत और गतिशील भूमिका होती है। निजी क्षेत्र अंतर्राष्ट्रीय व्यापार तथा वैश्विक पैमाने पर साथ सार्थक भूमिका निभा रहा है। यह बदला हुआ प्रशासनिक बदलाव की जो माँग करता है जिसमें सरकार की भूमिका आदेश एवं नियंत्रण परिस्थितिक प्रणाली में संसाधनों के आवंटन से आगे बढ़कर एक बाजार परिस्थितिकी प्रणाली को निवेशित समर्थित एवं नियमित करने की हो। राष्ट्रीय विकास को अब सार्वजनिक क्षेत्र से परे देखने की जरूरत है। सरकार को अर्थव्यवस्था के बड़े खिलाड़ी की अपनी भूमिका में परिवर्तन करके एक सामर्थ्यकारी वातावरण का पोषण करने वाले उत्प्रेरक की भूमिका में आना चाहिए जहाँ कि छोटे उद्यमियों से लेकर बड़ी कम्पनियों की उद्यमशीलता आगे बढ़ सके।
  2. राज्यों का विकास राष्ट्रीय लक्ष्य होना चाहिए क्योंकि राज्यों के विकास में ही देश की प्रगति है। इसी कारण केन्द्रीकृत नियोजन में सबके प्रति समान व्यवहार दृष्टिकोण स्वाभाविक रूप से अंतर्विष्ट रहता है, लेकिन अब यह व्यावहारिक नहीं है। राज्यों को भी सुना जाना जरूरी है और उन्हें भी कार्यान्वयन के लिए पर्याप्त लचीलापन प्रदान किया जाना चाहिए। डॉ. बी आर अम्बेडकर के कथन में, जहाँ केन्द्रीय नियंत्रण तथा एकरूपता अनिवार्य न हो या अव्यवहार्य हो, वहाँ सत्ता का केन्द्रीयकरण अनुचित है। भारत कीय वैश्विक अनुभवों तथा राष्ट्रीय सहक्रिया से उपजे और विकसित हो तथा स्थानीय, जरूरतो एवं अवध के अनुरूप भी हो।
  3. तकनीकी प्रगति तथा सूचना प्रसार ने भारत की सृजनशील ऊर्जा के लिए द्वार खोल दिए है। इससे हमारे विविधतापूर्ण क्षेत्रों तथा पारिस्थितिकी प्रणालियों एक राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था तथा समाज मेविन्यस्त कर दिया है और इससे समन्वय एवं सहकारिता का मार्ग प्रशस्त हुआ है। प्रौद्योगिकी की भूमिका में पारदर्शिता लाने एवं कार्यकुशलता बढ़ाने में सरकार और उत्तरदायी बने। हाल के दशकों में बहुत हद तक दुनिया भी एक ‘विश्वग्राम के रूप में विकसित हुई है। देश और समाज आपस में आधुनिक परिवहन, संचार, जन-माध्यम तथा अन्तर्राष्ट्रीय बाजारों एवं संस्थाओं के नेटवर्क के माध्यम से जुड़े हुए हैं। ऐसे वातावरण में भारत की आर्थिक क्रियाएँ वैश्विक गतिशीलता को बढ़ाती है। हमारी अर्थव्यवस्था भी सुदूर घट रही घटनाओं से भी प्रभावित हुए बिना नहीं रही है।
नीति आयोग के कार्य

नीति आयोग के कार्य

नीति आयोग को टीम इंडिया के नए सिद्धांत के अनुरूप तैयार होने के लिए औपचारिक रूप से निम्नलिखित कार्यों को करना होता है-

1. सहकारी एवं प्रतियोगिता पूर्ण संघवाद

यह सहकारी संघवाद के संचालन का प्राथमिक जिसमें राज्यों को राष्ट्रीय नीतियाँ बनाने में सहभागी बनाकर गुणात्मक एवं परिणामात्मक है कार्यान्वयन के लिए प्रधानमंत्री एवं मुख्यमंत्रियों की संयुक्त अधिकार शक्ति का उपयोग होता है। ऐसा केन्द्र एवं राज्य सरकारों के बीच व्यवस्थित एवं सुगठित अत क्रियाओं के माध्यम से समय है, विकास के मुद्दों के प्रति समझदारी बनाकर रणनीतियों एवं कार्यान्वयन प्रक्रियाओं को लेकर सर्वसम्म प्राप्त करने की कोशिश की होती है।

इस प्रकार केन्द्र से राज्य की ओर की एकतरफा नीति के स्थान पर सतत केन्द्र-राज्य सहभागिता की नीति अपनाई जाती है। आयोग इस सहयोग की इस प्रकार बढ़ाने मदद कर रहा है कि एक प्रतिस्पर्धी संघवाद को बढ़ावा मिले केन्द्र राज्यों के साथ तथा राज्य केन्द्र के. साथ प्रतिस्पर्धा करे, साथ ही राज्य आपस में भी प्रतिस्पर्धा करें, इस प्रकार देश के विकास का एक संयुक्त अभियान चले।

2. सुसंगतीकरण

सरकार ने विभिन्न स्तरों की क्षेत्र कार्यवाहियो। सुसंगतता स्थापित करने, एक-दूसरे क्षेत्र को प्रमाणित करने वाले मुद्दों पर बल दिया है। बल इस बात पर है कि विकास में एक समेकित एवं समग्र दृष्टिकोण पर सभी के बीच सहमति बने।

3. संघर्षों का समाधान

अंतर क्षेत्रीय, अंतर विभागीय, अंतर प्रांतीय तथा केंद्र राज्यों के बीच पारस्परिक सहमति का एक मंच बने और सबके हित में सर्वसम्मति का निर्माण हो। कार्यान्वयन के स्तर पर स्पष्टता एवं तीव्रता लाई जाए। आप नीति आयोग Hindibag पर पढ़ रहे हैं।

4. विशेषज्ञाता का संजाल

सरकार की नीतियों एक कार्यक्रमों में बाहरी विचारों को राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय विशेषज्ञों के एक सहयोगी समुदाय के माध्यम शामिल किया जाता है। इसके लिए सरकार का बाहरी दुनिया से जुड़ा होना आवश्यक है, अकादमिक जगत (विश्वविद्यालयों, थिंक टैक तथा शोध संस्थानों) निजी क्षेत्र विशेषज्ञता तथा व्यापक रूप में लोगों के नीति-निर्माण प्रक्रिया में सलग्न करना आवश्यक है। ऋग्वेद में कहा गया है “सभी दिशाओं में सदविचार के प्रवाह का हम स्वागत करें।”

5. क्षेत्र व्यूह रचनाएं

क्षेत्रीय एवं अन्तर क्षेत्रीय विशेषज्ञता व विशिष्टता का भंडार निर्मित करके केन्द्रीय मंत्रालयों एवं राज्य सरकारों के विकास नियोजन तथा उनकी समस्याओं का समाधान करने में सहायता प्रदान करना एक महत्वपूर्ण कार्य है। इससे सुशासन के सर्वोत्तम प्रचलनों (राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर) को विशेषकर देश में व्यवस्थागत सुधार एवं बदलाव के लिए अपनाने में सहयोग मिलता है।

6. दृष्टि एवं परिदृश्य नियोजन अंतर्राष्ट्रीय परामर्श

भारत के भविष्य के मध्यम तथा दीर्घकालीन व्यूहरचनात्मक रूपरेखा की डिजायन तैयार करता है। यही राष्ट्रीय सुधार एजेंडा के चालक है जो महत्वपूर्ण विचलनों की पहचान करके अब तक अनुप्रयुक्त क्षमताओं का पूरा उपयोग करते हैं। इन्हें अपनी सफलता तथा उपादेयता के प्रति आंतरिक रूप से सचेत एवं गतिशीत किया जाता है और ऐसा वातावरण सृजित किया जाता है जिसमें उभरता प्रवृत्तियों का समावेश किया ज सके और नयी चुनौतियों का उत्तर दिया जा सके। इस नयी संस्था की स्थिति भारत सरकार तथा राज्य सरकारों की समस्त विकास गतिविधयो का समेकन करने की है, इसलिए यह इस उद्देश्य के सर्वथा उपयुक्त है।

7. विश्व के साथ अंतरराष्ट्रीय समन्वय

नोडल प्वाइंट भारत के विकास के लिए वैश्विक विषय विशेषज्ञता संसाधनों का रणनीतिक इस्तेमाल करता है। आप नीति आयोग Hindibag पर पढ़ रहे हैं।

8. आंतरिक परामर्शिता

नीति आयोग निकाय नीति एवं कार्यक्रम को डिजाइन करने में केंद्र तथा राज्यों को आंतरिक परामर्शिता प्रदान करता है। जिनमें विकेंद्रीकरण लचीलापन तथा परिणामोंन्मुखता पर विशेष बल दिया जाता है। इसमें सर्वजनिक निजी भागीदारी की रचना तथा कार्यान्वयन संबंधी विदेश कुशलता भी शामिल है।

9. क्षमता निर्माण

सरकार में क्षमता निर्माण तथा ऐसी प्रौद्योगिकी की उन्नयन के लिए तैयारी पर जोर दिया जा रहा है, जो वैश्विक प्रवृत्ति तथा प्रबंधकीय एवं तकनीकी जानकारी पर आधारित हो। आप नीति आयोग Hindibag पर पढ़ रहे हैं।

10. विकेंद्रित नियोजन

नियोजन प्रक्रिया की पुनर्रचना करके इसे ‘सतह-ऊर्ध्य मॉडल’ के रूप में विकसित किया जाता है। राज्यों को मजबूत बनाते हुए उन्हें नीचे की स्थानीय सरकारों को सशक्त बनाने के लिए मार्गदर्शन दिया जाता है जिससे कि ग्राम स्तर पर विश्वसनीय योजनाओं के सूत्रण की एक प्रक्रिया विकसित की जा सके। भारतीय सरकारी संस्थाओं की परिपक्वता के साथ ही उनके कार्यों में विशेषज्ञता आ रही है। शासन के रणनीति’ तत्व को प्रक्रिया तथा कार्यान्वयन से अलग करके उस पर अधिक बल दिया जा रहा है। सरकार के एक समर्पित ‘थिंक टैंक के रूप में नीति आयोग यह निर्देशन भूमिका निभाता है।

11. सांझा राष्ट्रीय एजेंडा

देश के विकास की प्राथमिकताओं एवं रणनीतियों के प्रति एक साझा विजन’ विकसित हो रहा है। इससे राष्ट्रीय एजेंडा की एक रूपरेखा बन रही जिसका कार्यान्वयन प्रधानमन्त्री एवं मुख्यमन्त्री करते है।

12. केंद्र राज्यों का सच्चा मित्र

नीति आयोग केंद्र राज्यों को उनकी अपनी चुनौतियों का सामना करने में सहायता प्रदान करता है।

13. ज्ञान एवं नवाचार केंद्र

नीति आयोग सुशासन पर शोध एवं सर्वोत्तम प्रचलनों का एक संग्राहक तथा प्रसारक एक आधुनिक संसाधन केन्द्र के माध्यम से है। जो बढ़ती आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए संस्था नियोजन एवं रणनीति निर्माण से आगे जाकर विकास एजेंडे का लागू करने की और भी ध्यान दे रही है। इसके लिए कार्यान्वयन को नियोजन प्रक्रिया के केन्द्र में लाना है। केवल नियोजन अथवा योजना निर्माण की अवधारणा से कार्यान्वयन के लिए नियोजन की ओर बढ़ना है। यह सरकारी तंत्र के लिए उत्प्रेरक का कार्य करता है।

14. नियंत्रण एवं मूल्यांकन

नीति आयोग नीतियों एवं कार्यक्रमों का नियंत्रण एवं मूल्यांकन करता है, साथ ही उनके प्रभाव का मूल्यांकन भी कार्य प्रदर्शन मैट्रिक्स तथा व्यापक कार्यक्रम मूल्यांकन के आधार पर करता है। यह न केवल कमजोरियों एवं अवरोधों को चिन्हित कर उनका निदान करता है, बल्कि आँकडा संचालित नीति निर्माण के माध्यम से अधिक कार्यकुशलता तथा प्रभावकारिता को प्रोत्साहित करता है।

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