मानव समाज में नातेदारी व्यवस्था का विकास इन सभी प्रयत्नों का एक संयुक्त परिणाम है। एक साधारण से अवलोकन से यह स्पष्ट हो जाता है कि जो व्यक्ति हमसे विवाह या रक्त के द्वारा सम्बन्धित होते हैं, उन सभी से हमारे सम्बन्ध समान प्रकृति के नहीं होते। कुछ व्यक्तियों से हम अधिक निकटता महसूस करते हैं, जबकि कुछ व्यक्तियों से यह निकटता तुलनात्मक रूप से बहुत कम होती है। इसके बाद भी नातेदारी व्यवस्था एकमात्र ऐसा आधार है जिसके द्वारा हम कुछ लोगों को ‘अपना’ समझकर उनसे अनौपचारिक सम्बन्ध स्थापित करके सामाजिक जीवन में बन्धुत्व, समायोजन और सामूहिकता में वृद्धि करते है।

जब हम ‘नातेदारी’ शब्द का उपयोग करते हैं, तो आरम्भ में यह हमें एक बहुत सरल और सीधी-सी बात लगती है। सभी व्यक्ति इतना जानते हैं कि जो लोग एक घर-परिवार से सम्बन्धित होते हैं अथवा जो परिवार हमसे विवाह सम्बन्धों के द्वारा सम्बन्धित हैं, उनके सभी सदस्य रिश्तेदार अथवा नातेदार होते हैं। इन्हीं सदस्यों के पारस्परिक सम्बन्धों में जब सांस्कृतिक आधार पर हमें कुछ भिन्नता दिखाई देती है तब यही सीधी-सी बात कुछ जटिल दिखाई देने लगती है।

जब हम यह देखते हैं कि किसी समुदाय अथवा क्षेत्र में चाचा, मौसा, मामा तथा बुआ आदि के बच्चों को आपस में भाई-बहन माना जाता है और उनके बीच विवाह सम्बन्ध की अनुमति नहीं दी जाती तो स्वाभाविक रूप से मन में यह प्रश्न उठने लगता है कि दक्षिण भारत के अनेक भागों में मामा और फूफा के बच्चों के बीच विवाह को एक सामान्य परम्परा के रूप में क्यों देखा जाता है ? अनेक समाजों में जो पुरुष सन्तान को जन्म देता है, उसी को बच्चे का ‘पिता’ कहा जाता है, जबकि अनेक बहुपति विवाही समुदायों में अक्सर वह व्यक्ति बच्चे का पिता होता है जिसने उसे जन्म न देकर केवल उसके पालन-पोषण का दायित्व लिया हो।

नातेदारी

नातेदारी एक ऐसी व्यवस्था है जिसका सम्बन्ध केवल रक्त या विवाह से जुड़े हुए लोगों समूह से ही नहीं होता। नातेदारी एक ऐसा विन्यास है जिसमें अनेक नियमों के द्वारा यह निर्धारित किया के जाता है कि जिन व्यक्तियों के बीच रक्त अथवा विवाह के सम्बन्ध हैं, वह एक-दूसरे के प्रति किस तरह से व्यवहार करेंगे तथा नातेदारी सम्बन्धों के निर्धारण में जैविक अथवा सामाजिक आधार में से किसे अधिक महत्व दिया जाएगा? यही वह आधार है जिसके फलस्वरूप कुछ समूहों में पिता से वंश का क्रम आगे की ओर बढ़ता है, जबकि कुछ समूहों में वंश-क्रम माता के पक्ष से सम्बन्धित होता है।

नातेदारी व्यवस्था के अन्तर्गत कुछ लोगों से हमारे सम्बन्ध आदर और श्रद्धा के होते हैं तो कुछ सदस्य वह होते हैं जिनसे स्नेह करना हमारासामाजिक दायित्व होता है। अनेक निषेध हमसे यह आशा करते हैं कि नातेदारी से सम्बन्धित कुछ व्यक्तियों से हम पर्दा करें तो अनेक सदस्य ऐसे होते हैं जिनसे हंसी-मजाक करने से ही व्यक्ति की लोकप्रियता बदली है। यही थे जटिलताएं हैं जिनके बीच हमें यह जानना आवश्यक हो जाता है कि नातेदारी क्या है? कौन-से नियम विभिन्न नातेदारों के पारस्परिक सम्बन्धों का निर्धारण करते हैं, विभिन्न समुदायों में विवाह और की संरचना में भिन्नता क्यों पाई जाती है तथा किसी भी समाज की संरचना को समझने के लिए नातेदारी व्यवस्था को समझना क्यों आवश्यक है ?

नातेदारी व्यवस्था

नातेदारी व्यवस्था का अध्ययन विभिन्न जनजातीय समाजों की संरचना को स्पष्ट करने के लिए किया गया। ऐसे मानवशास्त्रियों में लुइस मॉरगन, रेडक्लिफ ब्राउन, मरडॉक, लेवी स्ट्रॉस, मैलीनॉस्की तथा हेनरी मेन के नाम विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं। बाद में यह महसूस किया जाने लगा कि जनजातियों के अतिरिक्त दूसरे समाजों में भी सामाजिक संरचना की प्रकृति बहुत बड़ी सीमा तक नातेदारी व्यवस्था से प्रभावित होती है।

इसके फलस्वरूप रॉबिन फॉक्स, डैरेक फ्रीमैन तथा श्नाइडर ने इस तथ्य की विवेचना करना आरम्भ की कि विभिन्न मानव समूहों में सामाजिक सम्बन्धों के निर्धारण में जैविक आधार कितना महत्वपूर्ण होता है तथा जिन व्यक्तियों को हम अपना निकट सम्बन्धी मानते हैं, उनसे हमारे सम्बन्ध किस तरह विकसित होते हैं? भारत में इरावती कर्वे ने विभिन्न क्षेत्रों का व्यापक अध्ययन करके नातेदारी व्यवस्था के महत्व को स्पष्ट किया, जबकि के. एम. कापड़िया ने नातेदारी व्यवस्था को ही विवाह और परिवार के वास्तविक आधार के रूप में स्वीकार किया।

सरल शब्दों में कहा जा सकता है कि नातेदारी रक्त और विवाह से सम्बन्धित व्यक्तियों के बीच सामाजिक सम्बन्धों और सम्बोधनों की वह व्यवस्था है जो इन सम्बन्धों से जुड़े हुए व्यक्तियों को उनके सामाजिक, पारिवारिक तथा जैविक अधिकारों और कर्तव्यों का बोध कराती है। उदाहरण के लिए, पिता-पुत्र, भाई-बहन, दादा-पौत्र, चाचा-भतीजा के सम्बन्ध रक्त पर आधारित होते हैं।

इस प्रकार इन सभी व्यक्तियों के लिए हम ‘समरक्तता’ शब्द का प्रयोग करते हैं। दूसरी ओर किसी स्त्री का अपने पति अथवा सास और श्वसुर से सम्बन्ध अथवा जीजा-साली का सम्बन्ध या एक स्त्री का अपने देवर और ननद से सम्बन्ध ‘विवाह-सम्बन्ध’ का उदाहरण है। ऐसे सभी सम्बन्धों को भिन्न-भिन्न सम्बोधनों के द्वारा व्यक्त किया जाता है तथा इन सम्बन्धों की प्रकृति भी एक-दूसरे से भिन्न होती है। ऐसे सभी सम्बन्धों की व्यवस्था को ही हम नातेदारी व्यवस्था कहते हैं।

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नातेदारी की परिभाषा

नातेदारी का आशय कुछ स्वजनों के बीच स्थापित होने वाले सम्बन्धों से है, यह स्वजन चाहे वास्तविक हों अथवा कल्पित समान रक्त वाले हों।

रॉबिन फॉक्स

नातेदारी सामाजिक उद्देश्यों के लिए स्वीकृत वंश सम्बन्ध है तथा यह सामाजिक सम्बन्धों के प्रधागत स्वरूप का आधार है।

रैडक्लिफ ब्राउन

नातेदारी वह व्यवस्था है जिसमें सामाजिक सम्बन्धों को जैविक शब्दों में व्यक्त किया जाता है।

लूसी मेयर

नातेदारी व्यवस्था के अन्तर्गत समाज द्वारा मान्यता प्राप्त वह सभी सम्बन्ध आते हैं जो वास्तविक अथवा कल्पित रक्त सम्बन्धों पर आधारित होते हैं।

चार्ल्स विनिक

नातेदारी व्यवस्था की विशेषताएँ

इन परिभाषाओं से नातेदारी व्यवस्था की कुछ मुख्य विशेषताएं स्पष्ट होती हैं जिन्हें संक्षेप में निम्नांकित रूप से समझा जा सकता है :

  1. यह व्यवस्था उन व्यक्तियों के पारस्परिक सम्बन्धों को स्पष्ट करती है जिनके बीच रक्त अथवा विवाह के सम्बन्ध पाए जाते हैं।
  2. रक्त सम्बन्धों का वास्तविक होना आवश्यक नहीं है, क्योंकि परिवार में किसी गोद लिए गए बच्चे को भी अपने माता-पिता का रक्त सम्बन्धी ही माना जाता है।
  3. नातेदारी सम्बन्ध समाज द्वारा स्वीकृत कुछ नियमों के अनुसार स्थापित होते हैं। विभिन्न समाजों में इन नियमों की प्रकृति एक-दूसरे से कुछ भिन्न होने के कारण ही विभिन्न समाजों में नातेदारी व्यवस्था की प्रकृति में कुछ विभिन्नता दिखाई देती है।

नातेदारी के प्रकार

नातेदारी का सम्बन्ध मुख्यतः उन व्यक्तियों से होता है जो एक-दूसरे से रक्त अथवा विवाह के द्वारा जुड़े होते हैं। इस आधार पर नातेदारी के निम्नलिखित दो स्वरूप प्रमुख है-

  1. रक्त सम्बन्धी नातेदारी
  2. विवाह सम्बन्धी नातेदारी

1. रक्त सम्बन्धी नातेदारी

इसके अन्तर्गत सभी व्यक्ति आते हैं, जो समान रक्त के कारण एक-दूसरे से सम्बन्धित होते हैं अथवा जिनमें समान रक्त होने की सम्भावना की जाती है। उदाहरण के लिए, माता-पिता, भाई-बहन, दादा-दादी, चाचा-बुआ, नाना-नानी, मामा आदि में समान रक्त होने की सम्भावना के कारण इन्हें रक्त सम्बन्धी नातेदारी कहा जाता है।

रक्त सम्बन्धियों के बीच वास्तविक रक्त सम्बन्ध होना आवश्यक नहीं होता। गोद लिए गए बच्चे भी अपने माता-पिता के रक्त सम्बन्धी नातेदार होते हैं। इसी प्रकार जिन जनजातीय समूहों में एक स्त्री अनेक पुरुषों से विवाह करती है यहां उसकी सन्तानों का अपने सभी पिताओं से रक्त सम्बन्ध मान लिया जाता है।

2. विवाह सम्बन्धी नातेदारी

यह नातेदारी सम्बन्ध उन व्यक्तियों के बीच स्थापित होते हैं, जो विवाह के द्वारा एक-दूसरे से सम्बन्धित होते हैं। उदाहरण के लिए, विवाह के द्वारा एक व्यक्ति केवल अपनी पत्नी से ही सम्बन्धित नहीं होता अपितु अपनी पत्नी के भाई-बहनों, माता-पिता, भाई की पत्नी, बहन के पति तथा उनके बच्चों आदि से भी सम्बन्धित होता है।

इसी प्रकार एक स्त्री विवाह के द्वारा केवल अपने पति से ही सम्बन्धित नहीं होती वरन पति के माता-पिता, भाई-बहनों भाई की पत्नियों बहनों के पतियों तथा वंश के अन्य लोगों से भी सम्बन्धित हो जाती है। ऐसे प्रत्येक सम्बन्ध के द्वारा उसे वंश में एक विशेष प्रस्थिति मिलती है। यही विवाह सम्बन्धी नातेदारी है। नातेदारी के इन प्रकारों के अभिप्रायों की विवेचना हम आगामी अध्याय में करेंगे।

नातेदारी की श्रेणियां

नातेदारी व्यवस्था के अन्दर सभी व्यक्तियों की निकटता समान नहीं होती। कुछ व्यक्ति रक्त अथवा विवाह द्वारा प्रत्यक्ष रूप से एक-दूसरे से सम्बन्धित होते हैं, जबकि कुछ लोगों से हमारा सम्बन्ध किसी अन्य व्यक्ति के माध्यम से होता है। नातेदारी व्यवस्था में विभिन्न व्यक्तियों की निकटता एक-दूसरे से कितनी अधिक या कम है, इसे सभी नातेदारों को निम्नांकित तीन श्रेणियों में विभाजित करके समझा जा सकता है-

1. प्राथमिक नातेदार

जिन व्यक्तियों के बीच रक्त अथवा विवाह का प्रत्यक्ष सम्बन्ध होता है, उन्हें एक-दूसरे का प्राथमिक नातेदार कहा जाता है। श्यामाचरण दुबे ने प्राथमिक नातेदारी के अन्तर्गत8 सम्बन्धों का उल्लेख किया है; जैसे—-पिता, पुत्र, पिता-पुत्री, माता-पुत्री, भाई-भाई, भाई-बहन, बहन-बहन तथा पति-पत्नी । इन उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि प्राथमिक नातेदार वे हैं जिनका रक्त अथवा विवाह के द्वारा प्रत्यक्ष सम्बन्ध होता है तथा इन सम्बन्धों के बीच में कोई अन्य व्यक्ति नहीं आता।

2. द्वितीयक नातेदार

जो व्यक्ति हमारे प्राथमिक नातेदार के प्राथमिक सम्बन्धी होते हैं, वे हमारे द्वितीयक नातेदार हो जाते हैं। उदाहरण के लिए, पिता से जन्म मिलने के कारण रक्त के आधार पर पिता हमारे प्राथमिक नातेदार हैं, जबकि दादा का हमारे पिता से प्राथमिक सम्बन्ध होने के कारण, वह हमारे द्वितीयक नातेदार हो जाएंगे।

रक्त के आधार पर ही माता हमारी प्राथमिक नातेदार होंगी, लेकिन माता का हमारे मामा से रक्त सम्बन्ध होने के कारण वह हमारे लिए द्वितीयक नातेदार हो जाएंगे। इसी तरह चाचा, ताऊ, बुआ, नानी, बहनोई, भाई की पत्नी आदि भी हमारे द्वितीयक नातेदार हैं, क्योंकि उनसे हमारा सम्बन्ध अपने प्राथमिक नातेदार, जैसे—पिता, माता, भाई अथवा बहन के कारण है।

3. तृतीयक नातेदार

वे व्यक्ति जो हमारे द्वितीयक नातेदारों के प्राथमिक सम्बन्धी होते हैं, उन्हें हम अपना तृतीयक नातेदार कहते हैं। उदाहरण के लिए, अपने पिता तथा माता की सभी बहनें हमारी द्वितीयक नातेदार होंगी, जबकि उन बहनों (बुआ तथा मौसी) के सभी बच्चों से हमारे सम्बन्ध तृतीयक नातेदारी के अन्तर्गत आएंगे। इस प्रकार सभी फुफेरे, मौसेरे तथा ममेरे भाई-बहन एक-दूसरे के तृतीयक नातेदार होते हैं।

तृतीयक नातेदारों के प्राथमिक सम्बन्धी हमारे लिए चौथी श्रेणी के नातेदार होते हैं, जबकि चौथी श्रेणी के प्राथमिक सम्बन्धी हमारे लिए पांचवीं श्रेणी के नातेदारों के अन्तर्गत आएंगे। इस तरह नातेदारी श्रेणियों का कितना ही विस्तार किया जा सकता है। नातेदारी की यही श्रेणियां हमें यह बताती हैं कि किसी विशेष व्यक्ति से हमारा वंश सम्बन्ध कितनी निकटता अथवा दूरी का है। इसी निकटता अथवा दूरी के आधार पर एक विशेष व्यक्ति के प्रति हमारे पारिवारिक अधिकारों तथा कर्तव्यों का निर्धारण होता है।

नातेदारी से सम्बन्धित स्वजनों के बीच स्थापित होने वाले सम्बन्धों का रूप विभिन्न व्यवस्थाओं में एक-दूसरे से कुछ भिन्न देखने को मिलता है। जो समुदाय पुरुष प्रधान सामाजिक व्यवस्था वाले होते हैं, उनमें नातेदारी से सम्बन्धित नियम उन समाजों से भिन्न होते हैं जिनमें स्त्रियों की सत्ता को अधिक महत्व दिया जाता है। इसी तरह कुल तथा वंशक्रम की प्रकृति नातेदारी सम्बन्धों को प्रभावित करती है। इसे समझने के लिए यह आवश्यक है कि पितृसत्ता, मातृसत्ता, कुल अथवा वंश-समूह तथा वंशक्रम की प्रकृति को स्पष्ट करने के साथ ही भारत में नातेदारी व्यवस्था के मुख्य प्रतिमानों को स्पष्ट किया जाए।

नातेदारी का सामाजिक महत्व

अन्य सामाजिक संस्थाओं के समान नातेदारी भी एक प्रमुख संस्था है। किसी सामाजिक संरचना को समझने के लिए इसका विशेष महत्व है। वास्तव में, नातेदारी एक ऐसी संस्था है जो एक वंश के विभिन्न सदस्यों के व्यवहारों को नियन्त्रित करती है तथा दूसरे सदस्यों की तुलना में व्यक्ति के अधिकारों और कर्तव्यों का निर्धारण करती है। सरल समाजों में व्यक्ति के व्यवसाय, उत्पादन, उपभोग के रूप तथा मताधिकार आदि की प्रकृति का निर्धारण भी अक्सर नातेदारी सम्बन्धों के आधार पर ही किया जाता है। विभिन्न क्षेत्रों में नातेदारी की इस सामाजिक भूमिका को निम्न प्रकार समझा जा सकता है:

  1. ब्राउन का कथन है कि नातेदारी का मुख्य कार्य विवाह और परिवार के रूप को व्यवस्थित बनाना है। कृषक और जनजातीय समाजों का रूप इतना सरल होता है कि यहां व्यक्ति के सामाजिक तथा पारिवारिक सम्बन्धों को व्यवस्थित बनाने के लिए कोई निश्चित नियम नहीं बनाए जा सकते। इस दशा में नातेदारी सम्बन्धों द्वारा ही यह स्पष्ट किया जाता है कि एक व्यक्ति के सम्बन्ध अन्य व्यक्तियों से किस प्रकार के होंगे, व्यक्ति किस समूह और कुल में विवाह सम्बन्ध स्थापित करेगा तथा सम्पत्ति अधिकारों के विषय में व्यक्ति के व्यवहार क्या होंगे।
  2. मरडॉक ने लिखा है कि नातेदारी व्यक्ति की द्वितीय रक्षा पंक्ति है। इसका तात्पर्य है कि सरल समाजों में नातेदारी सम्बन्ध व्यक्ति के सामाजिक बीमे का कार्य करते हैं। किसी विपत्ति अथवा कठिनाई के समय नातेदारों के द्वारा ही व्यक्ति को सामाजिक, आर्थिक तथा मनोवैज्ञानिक सुरक्षा प्रदान की जाती है। इससे व्यक्ति स्वयं को अकेला और असहाय महसूस नहीं करता।
  3. व्यक्ति की सामाजिक स्थिति का निर्धारण करने में भी नातेदारी सम्बन्धों की विशेष भूमिका है। सरल और छोटे समाजों में व्यक्ति की सामाजिक प्रस्थिति का निर्धारण उसके वंश की प्रतिष्ठा और शक्ति के आधार पर होता है। इसी कारण नातेदारी सम्बन्धों से बंधे हुए व्यक्ति सदैव एक-दूसरे की सहायता करते रहने का प्रयत्न करते हैं।
  4. सामाजिक संगठन को सुदृढ़ बनाने में भी नातेदारी का विशेष महत्व है। इस सम्बन्ध में नेल्सन बर्न ने लिखा है कि नातेदारी व्यवस्था में वे सभी तत्व विद्यमान हैं जिनकी समाज को संगठित बनाने के लिए आवश्यकता होती है। उदाहरण के लिए, सम्बन्धों की प्रगाढ़ता, प्रस्थिति और भूमिका का निर्धारण, सदस्यों द्वारा दायित्वों का निर्वाह तथा सामाजिक मूल्यों का पालन आदि इसी तरह के तत्व हैं।
  5. नातेदारी का एक विशेष कार्य व्यक्ति को अपने सामाजिक-सांस्कृतिक उत्तरदायित्वों का प्रशिक्षण देना है। नातेदारी समूह एक वृहत् परिवार अथवा कुल के समान है जिसमें सभी व्यक्ति बिना किसी स्वार्थ के अधिक-से-अधिक उत्तरदायित्वों को पूरा करते हैं तथा अपनी पारिवारिक प्रस्थिति, आयु और लिंग का ध्यान रखते हुए दूसरे सदस्यों को वंश के नियमों तथा सामाजिक मूल्यों का पालन करने का प्रशिक्षण देते हैं। इसी के फलस्वरूप व्यक्ति का जीवन अधिक अनुशासित बन जाता है।
  6. नातेदारी व्यवस्था अनेक सांस्कृतिक नियमों से बंधी होने के कारण परिवर्तनशील नहीं होती। इसके फलस्वरूप नातेदारी सम्बोधनों तथा नातेदारी की श्रेणियों के द्वारा एक विशेष समूह तथा कुल के इतिहास को भी सरलता से समझा जा सकता है।
  7. सामाजिक सम्बन्धों में सुदृढ़ता लाने में भी नातेदारी का विशेष योगदान है। विभिन्न सामाजिक आयोजनों जैसे— जन्म, मृत्यु, विवाह अथवा कर्मकाण्डों के अवसर पर सभी नातेदारों द्वारा एक स्थान पर एकत्रित होने तथा आयोजन में सहभाग करने से सामाजिक सम्बन्ध अधिक सुदृढ़ बनने लगते हैं। नातेदारी के इस सामाजिक महत्व को देखते हुए ही अधिकांश समाजविज्ञानी किसी विशेष समाज की संरचना को समझने के लिए नातेदारी सम्बन्धों का अध्ययन करना अधिक महत्वपूर्ण मानते हैं।
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