देवनागरी लिपि

देवनागरी लिपि एक ऐसी लिपि है जिसमें अनेक भारतीय भाषाएँ तथा कुछ विदेशी भाषाएँ लिखीं जाती हैं। देवनागरी लिपि में 14 स्वर और 33 व्यंजन सहित 47 प्राथमिक वर्ण हैं। आज देवनागरी लिपि का उपयोग 120 से अधिक भाषाओं के लिए किया जा रहा है। अधिकतर भाषाओं की तरह देवनागरी भी बायें से दायें लिखी जाती है।

देवनागरी लिपि का उद्भव

हिन्दी भाषा की लिपि देवनागरी है। देवनागरी लिपि का जन्म ब्राह्मी लिपि से हुआ है। ब्राह्मी संसार की सबसे प्राचीन ध्वनि लिपि है। गौरीशंकर हरीचन्द ओझा के अनुसार ब्राह्मी लिपि का आविष्कार आर्यों ने ही किया था। वैदिक संस्कृत और संस्कृत इसी लिपि में लिखी जाती थीं। बुद्ध के समय में इस लिपि का विस्तृत प्रयोग होता था। अशोक के अधिकतर शिलालेखों में ब्राह्मी लिपि का ही प्रयोग किया गया है।

देवनागरी लिपि का विकास

कुछ शिलालेखों में पश्चिम भारत में प्रचलित खरोष्ठी लिपि का प्रयोग भी किया गया है। लेकिन अशोक के समय प्रचलित लिपि ब्राह्मी ही थी। अशोक के बाद ब्राह्मी लिपि में परिवर्तन होना आरम्भ हुआ। शिक्षित लोग लिपि को सुन्दर बनाने का प्रयत्न करने लगे। कलम उठाए बिना अक्षर लिखने की प्रवृत्ति के कारण भी लिपि में परिवर्तन होना स्वाभाविक था। इसके अतिरिक्त शीघ्रता से लिखने के कारण भी लिपि में अनेक परिवर्तन हुए। गुप्त काल में ब्राह्मी लिपि का परिवर्तित रूप गुप्त लिपि कहलाया।

उत्तरी भारत में जो परिवर्तन हुए उनमें वर्णों का आकार थोड़ा कुटिल हो गया था इसलिए इस रूप को कुटिल लिपि की संज्ञा दी गई। इस कुटिल लिपि से शारदा और नागरी दो लिपियाँ निकलीं। नागरी लिपि का प्रयोग ईसा की 10वीं शताब्दी से माना जाता है। इसी नागरी को बारहवीं शताब्दी में देवनागरी लिपि कहा जाने लगा। क्यों? इसका कोई ठोस प्रमाण नहीं मिलता। आज की देवनागरी लिपि, प्राचीन देवनागरी का सुधरा हुआ रूप है। भारत में प्रयुक्त होने वाली अन्य लिपियाँ भी ब्राह्मी लिपि से ही निकली हैं।

देवनागरी लिपि

देवनागरी लिपि की विशेषताएं

  1. यह लिपि स्पष्ट एवं सुन्दर है।
  2. देवनागरी लिपि में प्रायः सभी मूल ध्वनियों के लिए पृथक्-पृथक् ध्वनि चिह्न हैं। इस लिपि की यह विशेषता है कि इसमें जैसा बोला जाता है वैसा ही लिखा जाता है और वैसा ही पढ़ा जाता है। इस लिपि का ध्वनि तत्त्व बड़ा ही वैज्ञानिक है।
  3. देवनागरी लिपि में स्वरों के स्थान पर उनकी मात्राओं का प्रयोग किया जाता है जिससे शब्दों का आकार अपेक्षाकृत छोटा हो जाता है।
  4. यह लिपि बाईं ओर से दाईं ओर को लिखी जाती है।
  5. देवनागरी लिपि भारत में प्रयुक्त होने वाली कई अन्य लिपियों-मराठी, बंगाली, गुजराती तथा गुरुमुखी आदि से बड़ा मेल खाती है। राष्ट्र की एकता की दृष्टि से यह अच्छी बात है। से
  6. इस लिपि में विदेशी ध्वनियों को भी व्यक्त कर सकने की शक्ति है। इस शक्ति के कारण ही यह संसार की सबसे अधिक समृद्ध लिपि है।
  7. हमारे देश का मूल साहित्य और संस्कृति इसी लिपि में सुरक्षित हैं।
देवनागरी लिपि का विकास
देवनागरी लिपि

देवनागरी लिपि की न्यूनताएं

  1. देवनागरी लिपि में अक्षरों की संख्या बहुत अधिक है।
  2. कुछ ध्वनियों में इतना कम अन्तर है कि अहिन्दी भाषा-भाषियों को उनके सीखने में बड़ा समय लगता है, जैसे-स, श तथा ष
  3. कुछ वर्णों की बनावट में भी बड़ा कम अन्तर है; जैसे-ब तथा वा
  4. स्वरों के लिए प्रयुक्त होने वाली मात्राएँ कभी व्यंजनों के पहले और कभी उनके बाद में लगती हैं; जैसे-किस तथा कील।
  5. ‘उ’ तथा ‘ऊ’ की मात्राएँ सभी व्यंजनों के तो नीचे लगती हैं परन्तु ‘र’ व्यंजन के बीच में लगती हैं, जैसे-कु, कू परन्तु रु, रू।
  6. संयुक्ताक्षरों को सीखना और लिखना कठिन पड़ता है।
  7. ‘र’ के चार रूप मिलते हैं-(र), जैसे-चरम; (‘), जैसे-चर्म; (), जैसे-ग्रह और (८), जैसे राष्ट्र। इनके अन्तर को जानना भी कठिन ही होता है।
  8. रेफ उच्चारण के क्रम में नहीं लिखा जाता तभी अधिकतर बच्चे आशीर्वाद (शुद्ध) के स्थान पर आर्शीवाद (अशुद्ध) लिखते हैं।
  9. अनुस्वार जिसके पश्चात् उच्चरित होता है उसके ऊपर लगता है; जैसे-गंगा, घंटा।
  10. अक्षरों की बनावट थोड़ी जटिल है।
  11. इसके मुद्रण और टंकन में भी थोड़ी कठिनाई पड़ती है।
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