दर्शन शिक्षा संबंध

दर्शन शिक्षा संबंध – दर्शन शब्द का अंग्रेजी रूपांतरण Philosophy शब्द दो यूनानी शब्दों Philos और Sofia से मिलकर बना है। जिसमें Philos का अर्थ है Love तथा Sofia का अर्थ है of Wisdom। इसप्रकार Philosophy का शाब्दिक अर्थ है ‘Love of Wisdom‘ (ज्ञान से प्रेम)। इस प्रकार दर्शन का शाब्दिक अर्थ विद्यानुराग या ज्ञान से प्रेम हुआ।

दर्शन शब्द में मानसिक प्रक्रिया के तीनों पक्ष ज्ञान, कर्म और भाव निहित है। सत्य का साक्षात दर्शन करना दर्शन है। प्रसिद्ध दार्शनिक प्लेटो ने बताया है कि मानव के मन में उत्पन्न अशांति, जिज्ञासा के कारण ही मानव का मन संवेदनशील, प्रगतिशील और परिवर्तनशील बनता है।

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दर्शन शिक्षा संबंध

दर्शन की परिभाषाएं

दर्शन की विभिन्न विद्वानों ने निम्न प्रकार प्रमुख परिभाषाएं दी हैं –

दर्शनशास्त्र को एक ऐसे प्रयास के रूप में परिभाषित किया जा सकता है, जिसके द्वारा मानव अनुभूतियों के संबंध में समग्र रूप में सत्यता से विचार किया जाता है अथवा जो संपूर्ण अनुभूतियों को बोधगम्य बनाता है।

दर्शन एक व्यवस्थित विचार द्वारा विश्व और मनुष्य की प्रकृति के विषय में ज्ञान प्राप्त करने का निरंतर प्रयास है।

आर डब्ल्यू सेलर्स

अन्य क्रियाओं के समान दर्शन का मुख्य उद्देश्य ज्ञान की प्राप्ति है।

वर्टेंड रसेल

इस प्रकार हम देखते हैं कि दर्शन के अंतर्गत प्रकृति व्यक्तियों व वस्तुओं तथा उनके लक्ष्य एवं उद्देश्यों के विषय में निरंतर विचार किया जाता है। यह ईश्वर ब्रह्मांड एवं आत्मा के रहस्य तथा इनके पारस्परिक संबंधों की विवेचना करता है।

अभिक्रमित शिक्षण की विशेषताए
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शिक्षा का अर्थ

वास्तविक अर्थ में शिक्षा जीवन के मूल्यों और आदर्शों से जुड़ी हुई है। शिक्षा व्यक्ति को उसके जीवन मूल्यों और आदर्शों से न केवल सैद्धांतिक रूप से परिचित कराती है बल्कि वह व्यक्ति को उन पर निरंतर चलने की प्रेरणा भी देती है।

यह जीवन मूल्य क्या है? हमारे व्यक्तिगत और सामाजिक आदर्श कौन-कौन से हैं? शिष्य के स्वभाव में सुधार किस दिशा में होना चाहिए? सच्ची शिक्षा किस प्रकार की हो? आज प्रश्नों का हल खोजने के लिए शिक्षा शास्त्रियों को दर्शनशास्त्र की मदद लेनी पड़ती है।

इस प्रकार हम यह कह सकते हैं कि शिक्षा दर्शन पर आधारित है तथा वह दार्शनिक सिद्धांतों को व्यवहारिक रूप प्रदान करती है।

दर्शन शिक्षा संबंध

दर्शन जीवन और समाज के मूल्यों और आदर्शों के विषय में निर्देशित करता है, समाज विशेष की संस्कृति के संदर्भ में इन मूल्यों तथा आदर्शों की गहराई में जाकर व्याख्या करता है तथा कुछ जीवन मानदंड निश्चित करता है। शिक्षा अपनी व्यवहारिकता योजनाओं के माध्यम से दार्शनिक सिद्धांतों को ही क्रियात्मक रूप प्रदान करती है। बिना दर्शन के शिक्षा का अपना कोई आधार नहीं है।

दर्शन शिक्षा

दर्शन शिक्षा संबंध को निम्नलिखित रूपों द्वारा दर्शाया जा सकता है –

  1. दर्शन व शिक्षा के उद्देश्य
  2. दर्शन व पाठ्यक्रम
  3. दर्शन व शिक्षण विधियां
  4. दर्शन व अनुशासन
  5. दर्शन व पाठ्य पुस्तकें
  6. दर्शन व शैक्षिक प्रशासन

1. दर्शन व शिक्षा के उद्देश्य

राशि के अनुसार शैक्षिक उद्देश्यों का जीवन के साथियों के साथ घनिष्ठ संबंध होता है और दर्शन यह निर्णय करता है कि जीवन का क्या उद्देश्य है, उसी स्थिति में शिक्षा के उद्देश्यों का निर्धारण भी उसी के द्वारा किया जाना स्वाभाविक है। वास्तव में हमारा जीवन के प्रति जैसा दृष्टिकोण होगा, शैक्षिक उद्देश्य भी हमारे द्वारा उसी प्रकार के निश्चित किए जाएंगे। अतः दर्शन शिक्षा संबंध क अंतर्गत दर्शन व शिक्षा के उद्देश्यों का होना भी आवश्यक है।

2. दर्शन व पाठ्यक्रम

शिक्षा दर्शन पर पाठ्यक्रम के संबंध में जितनी निर्भर है उतनी अन्य किसी शैक्षिक समस्या के संबंध में नहीं

रस्क के अनुसार

वस्तुतः पाठ्यक्रम पर दर्शन का अत्यधिक प्रभाव पड़ता है। उदाहरण के रूप में आदर्शवादी दर्शन के अनुसार शिक्षा का उद्देश्य जीवन के शाश्वत मूल्यों की प्राप्ति प्रकृति वादी दर्शन के अनुसार शिक्षा का उद्देश्य बालक की व्यक्तित्व का विकास करना है तथा प्रयोजनवादी पाठ्यक्रम में बालक की वर्तमान एवं भावी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु उपयोगी क्रियाओं का स्थान देने पर बल दिया जाता है।

इकाई योजना
दर्शन शिक्षा संबंध

3. दर्शन व शिक्षण विधियां

शिक्षा की उपर्युक्त विधि को हम तब तक निर्धारित नहीं कर सकते हैं जब तक हमें उद्देश्य का ज्ञान ना हो, इस प्रकार शिक्षण विधियां दर्शन से प्रभावित होती हैं। सुकरात ने अपने दार्शनिक विचारों के अनुसार प्रश्नोत्तर विधि को जन्म दिया। इसी प्रकार प्लेटो ने संवाद विधि को अरस्तू ने आगमन एवं निगमन विधि को बेकन ने प्रयोग एवं निरीक्षण विधि को रूसो ने स्वानुभाव एवं सक्रियता को तथा मांटेश्वरी ने इंद्रिय प्रशिक्षण विधि को सर्वोत्तम माना है। इस प्रकार शिक्षण विधियों का दर्शन शिक्षा संबंध में विशेष स्थान है।

4. दर्शन व अनुशासन

अनुशासन की धारणा भी दार्शनिक विचार धाराओं द्वारा प्रभावित होती है। जैसे प्रकृति वादी दंड विधान के अंतर्गत प्राकृतिक परिणामों तथा स्वतंत्रता पर बल देता है। आदर्शवादी शिक्षक प्रभाव के द्वारा अनुशासन की स्थापना करना चाहते हैं तो प्रयोजनवादी अनुशासन की स्थापना के लिए सामाजिक एवं सहयोगी क्रियाओं को महत्व देते हैं। जो कि दर्शन शिक्षा संबंध में विशेष स्थान रखता है।

5. दर्शन व पाठ्य पुस्तकें

पाठ्य पुस्तकों के चयन एवं निर्माण में भी दर्शन मुख्य कार्य करता है। पाठ्य पुस्तकों का चयन करते समय जीवन की मान्यताओं आदर्शों तथा सिद्धांतों को ध्यान में रखा जाता है क्योंकि उनके द्वारा जीवन में मानदंडों का स्थापन किया जाता है।

दर्शन शिक्षा संबंध
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6. दर्शन व शैक्षिक प्रशासन

शैक्षिक प्रशासन पर भी दर्शन का गहरा प्रभाव पड़ता है। शिक्षा क्षेत्र संगठन के हाथ में हो या शिक्षा पर राज्य का नियंत्रण हो, शिक्षक की नियुक्ति का क्या मानदंड हो तथा शिक्षा पद्धति में उसका स्थान क्या हो, विद्यालय भवन का स्वरूप कैसा हो, तथा विद्यालय में निरीक्षण के समय किन बातों पर ध्यान दिया जाए आदि प्रश्नों का उत्तर हमें दर्शन में ही मिल सकता है।

इसके अतिरिक्त दर्शन शिक्षा संबंध निम्न में भी भी पाए जाते हैं:-

  1. दर्शन जीवन के वास्तविक लक्ष्य का निर्धारण करता तथा उस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए शिक्षा का उचित मार्गदर्शन भी करता है।
  2. दर्शन शिक्षा को प्रभावित करता है तो शिक्षा भी दार्शनिक दृष्टिकोण पर नियंत्रण रखती है।
  3. प्रत्येक समय के महान दार्शनिक महान शिक्षा शास्त्री भी हुए हैं प्लेटो सुकरात रूसो गांधी टैगोर आदि के उदाहरण हमारे सामने हैं।
  4. शिक्षा शास्त्रियों के सम्मुख समय-समय पर अध्यापन के समय अनेक समस्याएं जन्म लेती रहती हैं। वे इन्हें समझाने के लिए दार्शनिकों का सहारा ढूंढते हैं और तब दार्शनिक नए शिक्षा दर्शन को जन्म देते हैं।

इस प्रकार शिक्षा और दर्शन का परस्पर गणित संबंध है वास्तव में दर्शन के मार्गदर्शन के बिना शिक्षा अर्थहीन हो जाएगी।

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