जापान कृषि विशेषताएं महत्व

जापान कृषि विशेषताएं – जापान में कृषि छोटे पैमाने पर होती है। यहां के कुल भूमि का केवल 16% भाग कृषि योग्य है। जापान में कृषि क्षेत्र सीमित होने के कारण यहां के किसान इस प्रकार की पद्धति को अपनाते हैं जिससे भूमि से अधिकतम उत्पादन किया जा सके। इस प्रकार सीमित भूमि पर पैदा होने वाले कृषि उत्पादों से कुल जनसंख्या के 60% भाग का ही भरण-पोषण हो पाता है। शेष जनसंख्या कृषि के अतिरिक्त अन्य पदार्थों पर निर्भर रहती है।

In 1939, the cultivated land in Japan proper represented not quite 16% of the total area.

Trewartha
जापान कृषि विशेषताएं
जापान कृषि विशेषताएं

जापान कृषि के प्रकार

जापान के लगभग दो तिहाई भाग पर्वतीय एवं पठारी हैं। इससे कृषि कार्य 20% से कम क्षेत्र पर ही हो पाता है। यहां मुख्य रूप से केवल नदियों की घाटियों, डेल्टा तथा समुद्र तटीय छोटे-छोटे मैदानों में कृषि के लिए भूमि है। जनसंख्या अधिक होने के कारण खेती ढालों पर भी की जाती है। जापान अपनी हर इंच भूमि का उपयोग करता है। इसी कारण जापान प्रति हेक्टेयर उत्पादन में एशिया के अन्य देशों से आगे है क्योंकि यहां कृषि एक अतिरिक्त समय का कार्य हो गया है। यहां के लोग कृषि क्षेत्रों के विकास के लिए सतत प्रयत्नशील रहते हैं।

1. तर कृषि

इस प्रकार की कृषि जलोढ़ मिट्टी वाले उन क्षेत्रों में की जाती है जहां की वार्षिक वर्षा 200 सेमी से अधिक होती है। नोबी मैदान, टोकाई प्रदेश में तटवर्ती मैदान, कान्टो मैदान तथा हांशू के तोयामा खाड़ी और वकसा खाड़ी के निकटवर्ती क्षेत्रों में इस प्रकार की कृषि की जाती है।

2. आद्र कृषि

100 से 200 सेमी वर्षा वाले क्षेत्रों में यह कृषि की जाती है। इस प्रकार की कृषि कॉप मिट्टी वाले क्षेत्रों जैसे – होकैडो के पश्चिमी एवं पूर्वी तटों, हांशू के पूर्वी और पश्चिमी तटों, आंतरिक सागर के तटीय भागों और उत्तरी क्यूशू के तटीय भागों में की जाती है।

जापान कृषि विशेषताएं
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3. शुष्क कृषि

जिन क्षेत्रों में 75 सेमी से कम वर्षा होती है और वर्षा की कमी सिंचाई द्वारा पूरी की जाती है उन भागों में यह कृषि की जाती है। इस प्रकार की कृषि तर कृषि और आद्र कृषि के निकटवर्ती क्षेत्रों में की जाती है।

4. सीढ़ीदार पहाड़ी कृषि

पहाड़ों को अपरदन से बचाने के लिए सीढ़ीदार खेत बनाए जाते हैं। इन सीढ़ीदार खेतों की चौड़ाई मात्र 1 फुट रहती है।

5. चल कृषि

इस प्रकार की कृषि जंगलों को साफ कर की जाती है। कृषि करने के बाद जब उसकी उपजाऊ शक्ति कम हो जाती है, तो उसे छोड़कर कृषक दूसरी जगह खेती करते हैं।

जापान कृषि
जापान कृषि विशेषताएं

जापान कृषि विशेषताएं

जापानी कृषि में विविधताएं देखने को मिलती है जिसके मुख्य कारण इस प्रकार हैं-

  1. गहन कृषि – कृषि भूमि की कमी के कारण जापान में सघन कृषि की जाती है। यहां एक ही कृषि फार्म से साल में कई फसलों का उत्पादन होता है। यहां के निचले भागों में धान की कृषि और ऊपरी भागों में आलू और सब्जियों की खेती की जाती है।
  2. सघन श्रमयुक्त कृषि – अन्य देशों की तुलना में जापानी कृषि श्रमयुक्त है क्योंकि यहां के खेतों का क्षेत्रफल बहुत छोटा है। इससे मशीनों द्वारा कृषि कार्य करना कठिन है। यहां पर रहने वाले परिवार के सभी सदस्य मिलकर कृषि कार्य करते हैं।
  3. उच्च उत्पादन युक्त कृषि – गहन कृषि के कारण यहां की मिट्टी में उपजाऊ तत्वों की कमी हो जाती है। अतः मिट्टी को उपजाऊ युक्त बनाने के लिए हरी खाद, मछली की खाद, कंपोस्ट खाद आदि का विशेष रूप से प्रयोग करते हैं। अतः यहां चावल का उत्पादन भारत से 3 गुना अधिक होता है।
  4. वैज्ञानिक एवं मशीनीकृत कृषि – यहां कृषि करने की नई-नई विधियों का आविष्कार किया गया है। उन्नतिशील मशीनों द्वारा फसलों पर कीटनाशक दवाओं का प्रयोग होता है। यह कृषि यंत्रों और कीटनाशक दवाओं का विश्व में सबसे बड़ा निर्यातक देश है। जापान के बने ट्रेक्टर, हल और हार्वेस्टर मलेशिया में सबसे अधिक लोकप्रिय हैं।
  1. सीढ़ीदार कृषि – सीढ़ीदार कृषि जापान की प्रमुख विशेषता है। इस प्रकार की कृषि को दो भागों में बांट सकते हैं –
    • निचले भागो की सिंचित खेती, जिसमें धान का उत्पादन होता है।
    • ऊपरी भागों की खेती, जिसमें फसलों के साथ-साथ फलों एवं सब्जियों की कृषि की जाती है।
  2. बहु फसली कृषि – यहां पर 2.5 एकड़ से भी कम क्षेत्र वाले खेत होते हैं। इसलिए अधिक उत्पादन के लिए एक फसल के साथ-साथ कई अन्य फसलें पैदा की जाती है। ढालो पर सब्जियों की खेती के साथ-साथ गेहूं की फसल भी उगाई जाती है। सन् 1990 में 60 लाख हेक्टेयर भूमि पर कृषि की गई परंतु फसलों का उत्पादन केवल 80 लाख हेक्टेयर भूमि पर ही हुआ है।
  3. मिश्रित फसली कृषि – यह बहुफसली कृषि होने के कारण भूमि की उपजाऊ शक्ति कम हो जाती है। जिसकी आपूर्ति की खादों का प्रयोग किया जाता है। मिश्रित फसल उत्पादन से फसल उपजाऊ बनी रहती है तथा मिट्टी का भी अपरदन नहीं होता है।
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