जापान की मिट्टियां

जापान की मिट्टियां – जापान में केवल 15% भूमि कृषि योग्य है, दूसरी ओर अत्यधिक भूमि का अपरदन जापानी कृषि पर प्रभाव डालता है। जापान एक पर्वतीय देश है। ऊचे भागों से निकलने वाली नदियां तीव्र गति से प्रवाहित होती है। जिससे मिट्टी का अपरदन अधिक होता है और मिट्टी कृषि योग्य नहीं रह पाती है।

मिट्टी भू-पृष्ठ पर मिलने वाले असंगठित पदार्थों की वह ऊपरी परत है जो मूल चट्टानों तथा वनस्पति के योग से बनती है। मिट्टी अपने जैविक व अजैविक पर्यावरण की उपज है। यह प्राकृतिक संसाधन का महत्वपूर्ण संसाधन भी है।

वैनेट के अनुसार
चीन की मिट्टियां, जापान की मिट्टियां
जापान की मिट्टियां

जापान की मिट्टियां

जापान का 85% भू-भाग पर्वतीय एवं पठारी है। जो पूरी तरह से किसी के लिए अयोग्य है। शेष 15% भू-भाग पर मिट्टी पाई जाती है। यहां की मिट्टी में प्रादेशिक विभिन्नता इसलिए पाई जाती है, क्योंकि यहां अग्ने चट्टानों की मात्रा अधिक है। कहीं-कहीं अवसादी चट्टानों पाई जाती हैं। बेसिन में स्थित समतल मैदान जलोढ़ मैदान ही है। मैदानों तथा घाटियों की जलोढ़ मिट्टी प्राकृतिक रूप से उपजाऊ है। इन उपजाऊ क्षेत्रों में मुख्य रूप से धान की खेती की जाती है। अतः अच्छी मिट्टी के अभाव में भी यह देश अपने खाद्यान्न आवश्यकता की पूर्ति कर लेता है।

1930 के बाद जापानी मृदा वैज्ञानिकों ने जलवायु, वनस्पति तथा रासायनिक संरचना को आधार मानकर जापान की मिट्टियों को निम्न प्रदेशों में बांटा है, जो इस प्रकार हैं-

  1. कटिबंधीय मिट्टियां
    • पॉडजोल मिट्टी
    • भूरे वन क्षेत्र की मिट्टी
    • लाल एवं पीली मिट्टी
  2. अकटिबंधीय मिट्टियां
    • लिथोसोल
    • ज्वालामुखी मिट्टी
    • बलुई मिट्टी
    • दलदली मिट्टी
    • जलोढ़ मिट्टी
    • प्लानोसोल
चीन की मिट्टी
जापान की मिट्टियां

कटिबंधीय मिट्टी

पॉडजोल मिट्टी

यह मिट्टी कोंणधारी वन तथा शीत प्रधान क्षेत्रों में पाई जाती है। इस मिट्टी प्रदेश में शंक्वाकार कम पत्तियां गिरते हैं, जिससे इन मिट्टियों में जैविक पदार्थों की कम मात्रा पाई जाती है। कुछ पत्तियां गिरती भी है तो कम तापमान के कारण यह उर्वक के योग्य नहीं बन पाते हैं।

भूरी वन क्षेत्र की मिट्टी

यह मिट्टी पतझड़ तथा कम वर्षा वाले क्षेत्रों में अधिक पाई जाती है उत्तरी हांशू उद्योग पर स्थित शीतोष्ण पतझड़ वाले बन प्रदेश में पाई जाने वाली मिट्टी में जीवांश की मात्रा अधिक पाई जाती है, क्योंकि यहां के जो वृक्ष पत्तियां गिराते हैं। वह पत्तियां गर्म जलवायु के कारण जल्दी सड़-गल जाती हैं। जिसके कारण इन क्षेत्रों में मिट्टी अधिक उपजाऊ होती है।

लाल एवं पीली मिट्टी

यह मिट्टी अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों पश्चिमी हांशू,क्यूशू और शिकोकू में पाई जाती है।अतः यह मिट्टी सदाबहार वन प्रदेश में पाई जाती है।यह प्रदेश जापान का सबसे अधिक आर्द्र वह गर्म क्षेत्र है। जिससे क्षेत्रों में वर्षा अधिक होती है वर्षा के कारण अपक्षालन की क्रिया अधिक होने से घुलनशील खनिज तत्व एवं ह्यूमस की कमी पाई जाती है।

चीन की मिट्टी का विभाजन
जापान की मिट्टियां

अकटिबंधीय मिट्टियां

जापान का 75% भाग पर्वतीय, खड़े ढाल वाला तथा बीहड़ है, जहां वर्षा के कारण अपरदन अधिक होता है। इसी कारण इन भागो की मिट्टी अपरिपक्व है। ऐसी मिट्टी को कटिबंधीय मिट्टी कहते हैं। इन मिट्टियों को 6 भागों में वर्गीकृत किया गया है-

1. लिथोसोल

यह 68% चैट पर पर पहाड़ी भागों में मिलती है। वर्षा के कारण मिट्टी में घुलनशील खनिज तथा जैविक पदार्थ अपक्षलित हो जाते हैं।अपरदन के कारण न तो मिट्टी की गहराई बढ़ पाती है न ही मिट्टी परिपक्व हो पाती है।

2. ज्वालामुखी मिट्टी

यह मिट्टी जापान के 35 %भाग पर फैली है।जो मुख्यता दक्षिणी क्यूशू, पूर्वी मध्यवर्ती हांशू के कान्टो तो मैदान में तथा दक्षिणी-पूर्वी होकैडो में मिलती है। इस मिट्टी पर देश में अवनालिका अपरदन तेजी से होता है।

3. बलुई मिट्टी

यह मिट्टी ढीली तथा शुष्क होती है। इस पर वर्षा का अधिक अपक्षालन होता है। जापान के तटवर्ती भागों में इस प्रकार की मिट्टी का विकास हुआ है।

चीन की मिट्टियां
जापान की मिट्टियां

4. दलदली मिट्टी

यह मिट्टी अत्यधिक आद्र भागों में मिलती है। जिन भागों के मैदानों पर जल प्लावन हो जाता है वहां इन प्रकार की दलदली मिट्टी पाई जाती है। आप जापान की मिट्टियां Hindibag पर पढ़ रहे हैं।

5. जलोढ़ मिट्टी

यह जापान की सबसे अधिक उपजाऊ मिट्टी है। यहां के 18% भाग पर पाई जाती है यहां की अधिकांश कृषि इस मिट्टी पर होती है जहां यह मिट्टी पाई जाती है। वहां धरातल समतल रहता है जल स्तर ऊंचा रहता है। अपरदन कम होता है मात्र चादर अपरदन होता है।

6.  प्लानोसोल

इन भागों में जल प्लावन रहता है इन पर सीढ़ीनुमा खेती तथा बांध बनाकर खेती की जाती है। जिससे प्राकृतिक धरातलीय पृवाह रुक जाता है यह मिट्टी भिन्न भू-भाग पर पाई जाती है। जिससे मिट्टी के कण जल द्वारा प्रवाहित होकर मिट्टी की निचली परत में जमा हो जाते हैं। जिससे मिट्टी के नीचे पर अवैध परत बन जाती है इस पर से जल्द रिसकर नीचे नहीं जा पाता है। जिससे वर्षाका जल पर्याप्त समय तक रुका रहता है। जो धान की खेती के लिए आवश्यक है।

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