जलवायु परिवर्तन

जलवायु परिवर्तन – अनियन्त्रित औद्योगिक विकास ने पृथ्वी, जल, वायु और आकश का जो हाल कर दिया है वह विश्व भर में वैज्ञानिकों की गम्भीर चिन्ता का विषय बन गया है। यही हाल रहा तो ऐसा प्रतीत हो रहा है कि जल्द ही दुनिया रहने लायक नहीं बचेगी प्रदूषित पर्यावरण ऐसी दीर्घकालीन समस्याएँ पैदा करेगा, जिनका समाधान लगभग असंभव होगा। अतः जरूरी है कि पृथ्वी के भविष्य की रक्षा करने की कारगर नीति तुरन्त बनाई जाये, परन्तु गरीब देशों और गरीब लोगों पर नहीं।

जलवायु परिवर्तन
जलवायु परिवर्तन

जलवायु परिवर्तन और उसके परिणामस्वरूप पृथ्वी के तापमान में निरन्तर वृद्धि के प्रति बढ़ती चिन्ता कोई नई बात नहीं। आज से एक सदी पहले ही वैज्ञानिकों ने यह भविष्यवाणी कर दी थी कि “जंगल की आग की तरह फैलती औद्योगिक क्रान्ति में ऊर्जा की जरूरतों की पूर्ति के लिए जिस तेज रफ्तार से जीवाश्मों को जलाया जा रहा है, उसके मद्देनजर पृथ्वी पर तापमान इस हद • तक बढ़ जायेगा कि उसे सामान्य धरातल पर लाना असंभव होगा।”

जलवायु परिवर्तन

जलवायु परिवर्तन एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसके साथ ही कई प्रतिक्रियाएँ जुड़ी हैं। विश्व वैज्ञानिकों की एक संस्था इंटरगर्वनमेंटल पैनल ऑफ़ क्लाइमेट चेंज (IPCC) के अनुसार तापमान में बढ़ोत्तरी के परिणामस्वरूप सन् 2030 तक विश्व में समुद्र के पानी का स्तर 20 सेमी. तक और अगली सदी के अंत तक 65 सेमी. तक बढ़ जायेगा। नजीतन 300 प्रशांत प्रवाल द्वीप से तरह मिट्टी में मिल सकते हैं और हिन्द महासागर तथा कैरेबियन सागर के अनेक द्वीप भी बुरी तरह तबाह हो सकते हैं।

यही नहीं, समुद्र के पानी के सतह की ओर प्रवाह से दुनिया के कई हिस्सों में भूमि लवण से दूषित हो जायेगी। उपजाऊ भूमि पर खारे पानी के प्रवेश से भूमि की उर्वराशक्ति कम हो जायेगी, जानलेवा उष्णकटिबन्धीय रोगों का प्रसार होगा, बाढ़ से प्रभावित पर्यावरणीय शरणार्थियों की संख्या दिनों-दिन बढ़ती जायेगी।

जलवायु परिवर्तन
जलवायु परिवर्तन

IPCC के अध्ययनों के अनुसार सुजिश्ता सदी में ग्रीन हाउस प्रभाव के परिणामस्वरूप पृथ्वी के तापमान में 0.5 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोत्तरी है, जबकि इसी अवधि में दुनिया में समुद्र के पानी का स्तर 10 से 20 सेमी. तक बढ़ गया है। मौजूदा सदी के सबसे गर्म पाँच वर्ष 80 के दशक में ही दर्ज किये गये।

IPCC का यह भी दावा है कि तापमान में बढ़ोत्तरी के परिणामस्वरूप आज दुनिया भर के ग्लेशियर बड़ी तेज रफ्तार से पिघल रहे हैं और 1980 से हिमपात का औसत भी निरन्तर घटता जा रहा है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) के मुताबिक आज वाशिंगटन डी.सी. में प्रतिवर्ष एक दिन के औसत से तापमान 38 डिग्री सेल्सियस को भी पार कर जाता है, जबकि साल में 35 दिन यही तापमान 32 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुँचता है।

जलवायु परिवर्तन के कारण

पृथ्वी के किसी स्थान की जलवायु जिन कारणों पर जलवायु परिवर्तन के कारण निर्भर करती है, उसमें सूर्य की किरणों का तिरछापन, सौर धब्बे, वायुमण्डल की पारदर्शिता, प्रदूषण की मात्रा इत्यादि प्रमुख हैं। सूर्य की किरणें जितनी सीधी पड़ेंगी उनसे उतनी ही अधिक उष्मा प्राप्त होगी, पर सौर ऊर्जा की पृथ्वी पर पड़ने वाली मात्रा को वायुमण्डल की पारदर्शिता भी नियन्त्रित कर सकती है।

जलवायु परिवर्तन के कारण

अस्थायी तौर पर ज्वालामुखी विस्फोट भी वायुमण्डल की पारदर्शिता को प्रभावित कर सकते हैं। उदाहरण के रूप में टम्बोरो (सुमात्रा) के 1815 के भयंकर ज्वालामुखी विस्फोट ने अगले पूरे वर्ष का मौसम बदल दिया था। 1816 में उत्तरी न्यूयार्क तथा न्यू-इंग्लैण्ड में हर महीने धुंध तथा कोहरा छाया रहा। इतिहास में यह वर्ष बिना ग्रीष्म ऋतु के वर्ष के रूप में जाना जाता है। उस वर्ष फसलों की भारी क्षति हुई थी।

औद्योगिक प्रदूषण के परिणामस्वरूप आज वायुमण्डल में कार्बन डाइऑक्साइड और धूलकणों की मात्रा में वृद्धि हो गई है। वायुमण्डल में कार्बन डाइऑक्साइड बढ़ने से पृथ्वी से अन्तरिक्ष की ओर होने वाले विकिरण में कमी आ जाती है। इसका सीधा परिणाम पृथ्वी के ताप में वृद्धि के रूप में होता है। धूल कण वायुमण्डल की पारदर्शिता को कम कर देते हैं। इससे पृथ्वी की सतह पर ऊर्जा कम पहुँच पाती है। इससे ताप गिरने लगता है।

19वीं शताब्दी के अन्त में 1940 तक प्रदूषण का प्रथम रूप प्रभावी रहा। इसका कारण जीवाश्म ईंधनों के जलाये जाने की दर में बहुत अधिक वृद्धि थी। इसके बाद अंधाधुंध औद्योगीकरण की होड़ ने वातावरण में धूल कणों की मात्रा बढ़ा दी। अभी तक ये कार्बन डाइऑक्साइड और धूल कणों की मात्रा में वृद्धि के परस्पर विरोधी प्रभाव एक-दूसरे को सन्तुलित किये हुए हैं, लेकिन इन दोनों का संतुलन बिगड़ गया तो पृथ्वी की जलवायु में भारी परिवर्तन हो सकता है।

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पर्यावरण अवनयनपर्यावरण संबंधी कानूनपर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986
पारिस्थितिक पिरामिडजलवायु परिवर्तनप्राथमिक स्तर पर पर्यावरण शिक्षा
माध्यमिक स्तर पर पर्यावरण शिक्षाविश्वविद्यालय स्तर पर पर्यावरण शिक्षा
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