जनसंख्या वृद्धि आर्थिक विकास

जनसंख्या वृद्धि आर्थिक विकास – मानवीय शक्ति का आर्थिक विकास से प्रत्यक्ष रूप से सम्बन्ध रहा है, जिसको सभी ने स्वीकार किया है। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि तकनीकी यंत्र, उपकरण, संपत्ति एवं पूँजी आर्थिक विकास में सहायता प्रदान करते हैं किन्तु उचित मानवीय साधनों के अभाव के कारण यह अपना पूर्ण रूप से प्रभाव प्रकट नहीं कर पाते हैं। मानवीय साधनों के महत्व के सम्बन्ध में अर्थशास्त्रियों के विचार निम्नवत है-

एक राष्ट्र की वास्तविक सम्पत्ति उसकी भूमि, जल, वन, तथा खानें, पशु सम्पत्ति एवं डालरों में निहित न होकर इसके समृद्ध एवं सुखी पुरुषों, स्त्रियों एवं बच्चों में होती है।’ आधुनिक आर्थिक अनुसन्धान द्वारा इस बात को सिद्ध कर दिया गया है कि व्यय मानवीय साधनों के स्वास्थ्य एवं शिक्षा पर किया जाता है वह एक उत्पादक विनियोग है न कि अनुत्पादक व्यय।

हिपपल के अनुसार

पूँजी, प्राकृतिक साधन, विदेशी सहायता तथा अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार की निश्चित ही आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका है।”

हारबीसन एवं मेयर्स के अनुसार

सभी सम्पत्तियों की सामूहिक उत्पत्ति से मानव की उत्पादन क्षमता अधिक है।

शूल्जे के अनुसार

अतः वर्तमान समय में मानवीय साधनों को अधिकतम महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है और मानवीय साधनों का प्रमुख स्रोत जनसंख्या है। इसीलिए आज आर्थिक विकास के विश्लेषण में जनसंख्या समस्या के गुणात्मक एवं परिमाणात्मक पक्षों पर सावधानी से विचार-विमर्श किया जाता है।

किसी भी देश की उन्नति मानवीय साधन संगठित करने की क्षमता पर निर्भर करती है। निःसंदेह किसी भी देश में जनशक्ति साधन राष्ट्र की विशाल पूँजी मानी है। लेकिन इन साधनों का यदि समुचित उपयोग हो और नये रोजगार के अवसर न उपलब्ध किये जाये, तो ये साधन देश के लिए भार बन जाते है।

राष्ट्रीय विकास के लिए अपनाई गई नीति में जनशक्ति आयोजन एक मौलिक तत्व है, फिर चाहे इसका उपयोग आर्थिक उन्नति के लिए आवश्यक कुशल कर्मचारी उपलब्ध कराने या लोगों को उत्पादक और सामाजिक दृष्टि से लाभप्रद रोजगार उपलब्ध कराने के लिए किया जाय। अधिकांश विकासोन्मुख देशों को विकास आयोजन के इस महत्वपूर्ण पक्ष के प्रति प्रभावी विचारधारा अपनाने की समस्या का सामना करना पड़ रहा है।

कृषि
जनसंख्या वृद्धि आर्थिक विकास

जनसंख्या वृद्धि आर्थिक विकास

तीव्र गति के आर्थिक विकास के लिए कृतसंकल्प देश को विकास की उचित नीति अपनाना आवश्यक है। ऐसे देश को अपनी बचत की दर में समुचित वृद्धि लानी चाहिए और कृषि के आधुनिकीकरण के साथ-साथ मानव में पूँजी लगाने का कार्यक्रम भी शुरू किया जाना चाहिए। लोगों की कार्य-कुशलता प्रभावी उपयोग के द्वारा मानवीय साधनों का समुचित विकास आधुनिक ढंग से उन्नति करने का एक अभिन्न अंग है।

राष्ट्र की संपत्ति, जनता के विकास और भौतिक साधनों के संग्रह पर निर्भर करती है। तीव्र गति से आर्थिक विकास के लिए भौतिक पूँजी और मानवी पूँजी दोनों का तेजी से संचय होना चाहिए। विज्ञान और टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में तेजी से उन्नति होने और औद्योगिक और आर्थिक संगठन में असमानता बढ़ जाने के परिणामस्वरूप मांग बढ़ जाने के कारण यह बहुत आवश्यक हो गया है।”

“धन का उत्पादन मनुष्य की जीविका के लिए, उसकी इच्छाओं की संतुष्टि के लिए, उसकी क्रियाओं, शारीरिक, मानसिक और नैतिकता के विकास के लिए केवल साधन मात्र है, परन्तु मनुष्य स्वयं ही उस धन की उत्पत्ति का मुख्य साधन है, जिसका वह अंतिम उद्देश्य है।”

मार्शल अल्फ्रेड के अनुसार,

धनी वातावरण के बीच में समुदाय और राष्ट्र गरीब रहे हैं, या अपनी मिट्टी की उर्वरता अथवा प्रचुर प्राकृतिक साधनों के होते हुए भी पतन की ओर या गरीबी की ओर चले गए है, केवल इसलिए कि वहाँ मानवीय तत्व निम्न कोटि का रहा है अथवा उसको बिगड जाने अथवा नष्ट हो जाने के लिए छोड़ दिया गया है।

प्रो. कार्वर के अनुसार

जनसंख्या वृद्धि आर्थिक विकास में सहायक

“जनसंख्या वृद्धि अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के लिए वरदान सिद्ध हो सकती है, बशर्ते घरेलू प्रशुल्क नीति सुदृढ़ हो एवं अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग उपलब्ध हो रहा हो।”

प्रो. पैनरोज के अनुसार,

जनसंख्या वृद्धि आर्थिक विकास की एक तर्कपूर्ण शर्त है।

प्रो. हैन्सन के अनुसार

“जनसंख्या वृद्धि का दबाव आर्थिक विकास को प्रोत्साहित करता है।”

प्रो. हर्षमैन के अनुसार

इस बात के प्रमाण मिलते हैं कि आधुनिक समय में जनसंख्या वृद्धि के साथ-साथ कुल उत्पादन में भी वृद्धि हुई है और बहुत से क्षेत्रों में यह वृद्धि इतनी अधिक रही है कि उनकी प्रति व्यक्ति उपज में भी दीर्घकालीन वृद्धि हुई है।”

साइमन कुजनेट्स के अनुसार,

“उत्पादन की गत्यात्मकता और जनसंख्या की गत्यात्मकता की प्रवृत्तियों परस्पर पूरक हैं।”

प्रो. रे वुशकीन के अनुसार,

“आर्थिक विकास की गति जनसंख्या वृद्धि की तुलना में कही अधिक मात्रा में बढ़ाई जा सकती है।

प्रो. बोने के अनुसार,

“जनसंख्या वृद्धि कृषि द्वारा कृषि व औद्योगिक क्षेत्र में आशातीत उन्नति की जा सकती है।’

कोलिन क्लार्क के अनुसार,

जनसंख्या वृद्धि आर्थिक विकास में सहायक है जनसंख्या व आर्थिक विकास के पक्ष में निम्नलिखित तर्क दिये जा सकते हैं-

1. कार्यशील श्रम की उपलब्धता

“अन्य बातें समान रहने पर जनसंख्या की प्रत्येक वृद्धि श्रम शक्ति को बढ़ाती है।”

साइमन कुजनेट्स के अनुसार,

2. औद्योगिक विकास में सहायता

“उद्योग और वाणिज्य किसी भी समाज के विकास में उतने ही आवश्यक है, जितना शरीर के लिए रक्त प्रवाह की क्रिया।”

सिम्स के अनुसार

3. पूँजी निर्माण

“अदृश्य श्रम शक्ति एक प्रकार की अदृश्य बचत (Disguised Saving) है और अदृश्य बेरोजगारी के रूप में उन अदृश्य सम्भाव्य बचतों को पूँजी निर्माण के लिए प्रयुक्त किया जा सकता है। इससे कृषि उत्पादन पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं होगा एवं निर्माण की दर में वृद्धि होगी।”

प्रो. रेगनर नर्क्स के अनुसार,

4. बाजार का विस्तार

“निम्न आयस्तर वाले देशों में देशीय बाज़ार की सीमितता उसमें माल बेचने वाली किसी फर्म अथवा उद्योग के अधिक पूंजी लगाने के रास्ते में बाधा है। इस दृष्टि से देशीय बाजार का छोटा आकार विकास से लिए यथार्थ अड़चन है।’

रेगनर नक्स के अनुसार,

5. कौशल संवर्द्धन

“आर्थिक उत्पादन की वृद्धि परिक्षित ज्ञान के स्टॉक का फलन है और जनसंख्या में वृद्धि सृजनात्मक शक्तियों का सृजन करती है जिससे कौशल निर्माण को बल मिलता है, नये ज्ञान का भण्डार बढ़ता है और राष्ट्रीय उत्पादन में वृद्धि होती है।”

साइमन कुजनेट्स के अनुसार,

6. तकनीकी उन्नति तथा संगठनात्मक सुधार

“जनसंख्या वृद्धि श्रम विभाजन के विस्तार तथा अधिक विशिष्टीकरण को सम्भव करेगी, पैमाने की बचतों को पैदा करेगी और • तकनीकी प्रगति तथा संगठनात्मक सुधारों को बढ़ावा देगी।”

डॉ. डी. ब्राइटसिंह के अनुसार

7. उत्पादकता में वृद्धि

“श्रम उत्पादकता में वृद्धि औद्योगिक अर्थव्यवस्थाओं के आर्थिक विकास की एक पूर्व शर्त रही है जिसका प्रत्यक्ष प्रमाण अमेरिका व जापान द्रुत आर्थिक विकास है, जो पूरी तरह से श्रम की उत्पादकता में वृद्धि के कारण सम्भव हो सका है।”

डॉ. कौण्ड्रिक के अनुसार,

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जनसंख्या वृद्धि आर्थिक विकास में बाधक

जनसंख्या वृद्धि आर्थिक विकास में बाधक है इस संबंध में निम्न विचार दिए जा सकते हैं-

1. आर्थिक विकास की दर पर ऋणात्मक प्रभाव

“जनसंख्या में वृद्धि आर्थिक विकास की दर पर ऋणात्मक प्रभाव डालती है।

प्रो. सिंगर के शब्दों में

2. पूंजी निर्माण को कम करना

“आश्रितों का अधिक मात्रा में होना समाज के साधनों के काफी बड़े भाग को, जो पूंजी निर्माण के लिए प्रयुक्त होता, उन आश्रितों के ऊँचे प्रतिशत के पोषण की ओर ले जाता है जो कभी भी उत्पादक नहीं बनेंगे और यदि बनेंगे तो भी थोड़े समय के लिए।”

प्रो. मायर के अनुसार

“जनसंख्या वृद्धि का प्रभाव प्रायः प्रति व्यक्ति उत्पादन को कम करने का होता है।’

पेपलेसिस और मियर्स के अनुसार,

3. निवेश बढ़ाना

जनसंख्या की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि जनसंख्या वृद्धि की ऊँची दर एक निर्धारित प्रति व्यक्ति उत्पादन को प्राप्त करने के लिए आवश्यक विनियोग की मात्रा को बढ़ा देती है जबकि विनियोग साधनों की पूर्ति में वृद्धि करने के लिए वह कुछ नहीं करती।”

कोल एण्ड हूवर के अनुसार,
भाषा के रूप, मातृभाषा ही शिक्षा का माध्यम क्यों?
जनसंख्या वृद्धि आर्थिक विकास

4. प्रति व्यक्ति आय में कमी

“जनसंख्या एक दीर्घकालीन कारक होते हुए भी अल्पकाल में महत्वपूर्ण सिद्ध होती है क्योंकि वह प्रति व्यक्ति आय की वर्तमान दर के निर्धारक का कार्य करती है अर्थात् उसकी वर्द्धमान प्रवृत्ति आय को नीचा बनाये रखने के लिए उत्तरदायी होता है।’

लीविन्स्टीन के अनुसार,

5. प्रति व्यक्ति पूँजी की उपलब्धता में कमी

“जनसंख्या की तीव्र वृद्धि श्रम की औसत उत्पादकता को बढ़ाने और प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि करने के लिए उपलब्ध पूँजी की मात्रा को निश्चित रूप से घटाने की प्रवृत्ति रखती है।

कोल तथा हूबर के अनुसार

“घनी आबादी वाले देश में जनसंख्या की तीव्र वृद्धि आर्थिक विकास की प्रमुख बाधा है क्योंकि वह निवेश हेतु आवश्यक प्रति व्यक्ति अतिरेक को कम करती है।”

लीविन्सटीन के अनुसार,
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