कहानी शिक्षण

कहानी शिक्षण – कहानी सुनने और कहने की शिक्षा शिशु कक्षा से प्रारम्भ करने और कहानी लेखन की शिक्षा कक्षा 3 से प्रारम्भ करने की बात हम तत्सम्बन्धी अध्यायों में स्पष्ट कर चुके हैं। कहानियों में बच्चों की स्वाभाविक रुचि होती है इसलिए लिखित भाषा की शिक्षा का प्रारम्भ कहानी शिक्षण से ही करना चाहिए। प्राथमिक स्तर की प्रथम कक्षा में बच्चों को क्रमशः वर्णों, शब्दों और वाक्यों को पढ़ना-लिखना शुरू कराया जाता है। इन वाक्यों में यदि किसी घटना का वर्णन अथवा दो प्राणियों की वार्तालाप हो तो अधिक अच्छा होता है। और यह कहानी का प्रथम रूप होता है। जैसे-जैसे बच्चों का स्तर उठता जाए तैसे-तैसे कहानियों का स्तर भी उठता जाना चाहिए।

कहानी के प्रकार

कहानियों को मुख्य रूप से चार वर्गों में बाँटा जा सकता है-

  • घटनाप्रधान कहानियाँ – जिनमें घटना विशेष के वर्णन पर अधिक बल रहता है और जिनका उद्देश्य किसी पौराणिक कथा, ऐतिहासिक घटना अथवा वास्तविक जीवन की किसी घटना के तथ्यों को स्पष्ट करना होता है, घटनाप्रधान कहानियाँ कही जाती हैं।
  • चरित्रप्रधान कहानियाँ – वे कहानियाँ जिनमें घटना के माध्यम से उसके सक्रिय पात्रों का चरित्र उभार कर प्रस्तुत किया जाता है, चरित्रप्रधान कहानियाँ कही जाती है।
  • समस्याप्रधान कहानियाँ – इन कहानियों में किसी धार्मिक, राजनैतिक अथवा सामाजिक समस्या को आधार बनाया जाता है और उसके समाधान में ही इनकी सफलता निहित होती है।
  • मनोवैज्ञानिक कहानियाँ – वे कहानियाँ जिनमें पात्रों की मनोदशा के विश्लेषण पर अधिक बल रहता है, इस वर्ग में आती हैं।

किस स्तर पर कैसी कहानियाँ पढ़ाई जाएँ?

छोटे बच्चों के शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक विकास को दृष्टि में रखते हुए उन्हें घटनाप्रधान कहानियाँ पढ़ानी चाहिएँ। छोटे बच्चों की रुचि अपने इर्द-गिर्द प्रत्यक्ष पर्यावरण से सम्बन्धित कहानियों में ही होती है। इस स्तर पर बच्चों को जो भी कहानियाँ पढ़ाई जाएँ वे सरल एवं सुबोध भाषा में हों और उनकी विषय-सामग्री बच्चों के निजी पर्यावरण से सम्बन्धित हो।

छोटे बच्चे उन पशु-पक्षियों की कहानियाँ पढ़ने में भी आनन्द लेते हैं जिनसे उनका प्रत्यक्षीकरण हो चुका है, अतः उन्हें पशु-पक्षियों की कहानियों पढ़ाई जाएँ। प्राथमिक स्तर के बच्चे आश्चर्यजनक कहानियों में बड़ा आनन्द लेते हैं। उन्हें परियों की काल्पनिक कहानियाँ पढ़ानी चाहिएँ। छोटे बच्चों को ऐसी कहानियाँ अधिक प्रिय होती हैं जिनमें शब्दों अथवा वाक्यों की आवृत्ति और वार्तालाप की अधिकता होती है।

अतः उनके लिए वार्तालाप-प्रधान कहानियाँ ही चुननी चाहिएँ। पूर्व माध्यमिक स्तर के बच्चे पूर्व किशोरावस्था के होते हैं। इन बच्चों के संवेग बड़े अस्थिर होते हैं। उन्हें कभी तो काल्पनिक कहानियों में आनन्द आता है और कभी वे इन्हें कोरी कल्पना की बात कहकर छोड़ देते हैं। इस स्तर पर बच्चों को जो भी कहानियाँ पढ़ाई जाएँ उनकी कथावस्तु सत्य पर आधारित हो तो उत्तम होगा। हाँ, कल्पना की उड़ान से उन्हें अधिक-से-अधिक रोचक अवश्य बनाया जाना चाहिए।

माध्यमिक कक्षाओं तक आते-आते बच्चों के संवेग कुछ स्थिर हो जाते हैं। वे अपने अस्तित्व का अनुभव करने लगते हैं और उन्हें कोरी गप्पों में आनन्द नहीं आता। उन्हें अब वे कहानियाँ पसन्द होती हैं जिनमें किसी चरित्र विशेष की चर्चा की गई होती है। यह मनोवैज्ञानिक सत्य है कि किशोरावस्था में बच्चे आश्चर्यजनक खोजों वीर कृत्यों और आदर्श कार्यो की चर्चा में आनन्द लेते हैं।

अतः इस स्तर पर वीरों के चरित्रों की व्याख्या करने वाली कहानियों, आश्चर्यजनक खोजों से सम्बन्धित कहानियों और ऐसी कहानियों जिनमें आदर्श चरित्रों का वर्णन मिलता हो, पढ़ानी चाहिए। माध्यमिक स्तर के बच्चे ऐसी कहानियों में भी रुचि लेते हैं जिनमें समाज की यथार्थ स्थिति का दिग्दर्शन कराया गया हो। ये कहानी यदि आदर्शोन्मुख हों तो और भी अधिक अच्छा होता है।

इस स्तर पर एक-दो कहानियाँ ऐसी भी पढ़ायी जा सकती हैं जिनमें अन्तर्द्वन्द्व की अधिकता हो। समस्या प्रधान एवं मनोवैज्ञानिक कहानियाँ भी पढ़ाई जा सकती हैं। इस स्तर के बच्चे कहानियों की आलोचना भी करने लगते हैं। अतः इस स्तर पर पढ़ायी जाने वाली कहानियाँ कथावस्तु कथोपकथन, भाषा-शैली, चरित्र चित्रण, देश-काल, उद्देश्य और संवेदनशीलता, सभी दृष्टियों से आदर्श कहानियाँ होनी चाहिए।

कहानियों का चयन

किसी भी स्तर के लिए कहानियों का चयन करते समय यह अवश्य देखना चाहिए कि

  1. कहानी का शीर्षक छोटा, स्पष्ट, सारगर्भित और औत्सुक्यवर्द्धक हो जिससे छात्र शीर्षक सुनकर अथवा पढ़कर ही कहानी पढ़ने के लिए उत्सुक हो जाए।
  2. कहानी का कथानक स्वाभाविक हो, यहाँ तक कि काल्पनिक कथानक भी वास्तविकता से दूर न हो। ऐसी ही कहानियाँ हृदय को स्पर्श करती हैं।
  3. उनमें कम-से-कम पात्र हों, उन पात्रों के अपने चरित्र हों जो समाज के चरित्र विशेषों का प्रतिनिधित्व करते हों।
  4. कथोपकथन कहानी को आगे बढ़ाने और पात्रों के चरित्रों को स्पष्ट करने में सहायक होते हैं, अतः कहानियों में कथोपकथन का समावेश होना चाहिए।
  5. कहानियों में कथोपकथन के साथ-साथ क्रिया भी होनी चाहिए, क्रिया इस रूप में प्रस्तुत की जाए कि पाठक उसके परिणाम को जानने के लिए जिज्ञासु हो उठें।
  6. कहानी की भाषा बच्चों के भाषायी ज्ञान की दृष्टि से सरल हो और उसकी लेखन शैली रोचक तथा प्रवाहपूर्ण हो।
  7. कहानी में देश-काल अथवा पर्यावरण की व्याख्या तो न हो परन्तु उसका संकेत अवश्य हो,अन्यथा उसमें स्वाभाविकता का अभाव हो जाएगा।
  8. कहानी में जिस घटना, विचार अथवा भाव की अभिव्यक्ति हो वह उसकी चरम सीमा तक की गई हो जिससे पाठक को उसकी गूढ़तम अनुभूति हो सके।
  9. कहानी से कोई नसीहत मिले। हम भारतीय हैं, कला के लिए कला का आदर्श हमें मान्य नहीं है; हम सत्यं शिवं और सुन्दरं के पुजारी हैं अतः कहानी अध्ययन से मनोरंजन के साथ-साथ जीवन के लिए उपयोगी शिक्षाएँ भी प्राप्त होनी चाहिए।
कहानी
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कहानी शिक्षण की प्रणालियाँ

गद्य की अन्य विधाओं के शिक्षण की भाँति कहानी शिक्षण भी कई प्रणालियों से किया जाता है। इनमें चार प्रणालियाँ मुख्य हैं-

  1. अर्थ कथन प्रणाली
  2. व्याख्या प्रणाली
  3. विश्लेषण प्रणाली
  4. समीक्षा प्रणाली
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