कल्याणकारी राज्य

सम्पूर्ण जनता के हित के कार्य करने वाला राज्य परन्तु मानव हित के साधन के रूप में राज्य का विचार कोई नवीन विचार नहीं है। इस रूप में कल्याणकारी राज्य का ही प्रतीक है। महाभारत, पाराशर की स्मृतियाँ तथा मार्कण्डेय, मनु और याज्ञवल्क्य आदि के विचार में कल्याणकारी राज्य की अवधारणा स्पष्ट दिखाई देती है। जैसे – महर्षि वेदव्यास ने महाभारत में लिखा है कि “जो नरेश अपनी प्रजा को पुत्र के समान समझकर उसकी चतुर्मुखी उन्नति का प्रयत्न नहीं करता, वह नरक का भागी होता है।”

महाभारत के शान्तिपर्व में कहा गया है कि “राज्य को निरंतर सत्य की रक्षा करनी चाहिए, व्यक्तियों के नैतिक जीवन का पथ प्रदर्शन शुद्धीकरण तथा नियंत्रण करना चाहिए तथा पृथ्वी को मनुष्य के लिए निवास योग्य एक सुखदायिनी बनाना चाहिए।” प्लेटो और अरस्तू जैसे विचारक भी राज्य को एक नैतिक संगठन मानते हैं जिसका उद्देश्य सभी नागरिकों के हित में कार्य करना है। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि अपने मूल रूप में कल्याणकारी राज्य की धारणा सदैव ही विद्यमान रही। है। वर्तमान में कल्याणकारी राज्य के स्वरूप को विश्व के सभी देशों की शासन व्यवस्थाओं में किसी न किसी रूप में स्वीकार किया गया है।

अल्पविकसित देश की व्यवस्था, कल्याणकारी राज्य

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कल्याणकारी राज्य की परिभाषा

कल्याणकारी राज्य की प्रमुख परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं

  1. डॉ. अब्राहम ने कल्याणकारी राज्य को परिभाषित करते हुए कहा है कि, “कल्याणकारी राज्य वह है जो अपनी आर्थिक व्यवस्था का संचालन आय के अधिकाधिक समान वितरण के उद्देश्य से करता है।”
  2. एनसाइक्लोपीडिया ऑफ स्पेशल साइंसेज के अनुसार, “कल्याणकारी राज्य का तात्पर्य एक ऐसे राज्य से है जो अपने सभी नागरिकों को न्यूनतम जीवन स्तर प्रदान करना अनिवार्य उत्तरदायित्व समझता है।”
  3. केण्ट के अनुसार, “लोकहितकारी वह राज्य है जो अपने नागरिकों के लिए व्यापक समाज सेवाओं की व्यवस्था करता है।”
  4. जवाहर लाल नेहरू की मान्यता है कि, “सबके लिए समान अवसर प्रदान करना, अमीरों और गरीबों के बीच अन्तर मिटाना और जीवन स्तर को ऊपर उठाना लोकहितकारी राज्य के आधारभूत तत्व हैं

उपरोक्त वर्णित सभी परिभाषाओं में कल्याण के आर्थिक पक्ष पर ही अधिक बल दिया गया है, जबकि कल्याण की धारणा केवल भौतिक ही नहीं वरन् मानवीय स्वतंत्रता और प्रगति से भी सम्बन्धित है। सन् 1954 में मैसूर विश्वविद्यालय में भाषण देते हुए न्यायमूर्ति छागला ने कल्याणकारी राज्य की सही धारणा प्रस्तुत की। छागला के अनुसार, “कल्याणकारी राज्य का कार्य एक ऐसे पुल का निर्माण करना है जिसके द्वारा व्यक्ति जीवन की पतित अवस्था से निकलकर एक ऐसी अवस्था में प्रवेश कर सके जो उत्थानकारी तथा उद्देश्यपूर्ण है। कल्याणकारी राज्य का यथार्थ उद्देश्य नागरिक द्वारा सच्ची स्वतंत्रता के उपयोग को सम्भव बनाना है।”

कल्याणकारी राज्य

इस प्रकार स्पष्ट है कि कल्याणकारी राज्य का अर्थ है – राज्य के कार्य क्षेत्र का विस्तार कल्याणकारी राज्य की धारणा राजनीतिक स्वतंत्रता और आर्थिक सुरक्षा के बीच सामंजस्य स्थापित करने का एक प्रयास है। इस वर्ष में यह पश्चिमी प्रजातंत्र तथा साम्यवादी अधिनायकतंत्र दोनों से अलग है। हॉब्समेन के शब्दों में, “यह कल्याणकारी (राज्य) दो मोतियों में एक समझौता है जिसमें एक तरफ साम्यवाद है, दूसरी तरफ नियंत्रित व्यक्तिवाद।” कल्याणकारी राज्य जनता के सभी वर्गों के लिए कल्याण के लिए कार्य करता है।

कल्याणकारी राज्य की विशेषताएँ

लोककल्याणकारी राज्य की विशेषताएँ निम्न हैं-

1. आर्थिक सुरक्षा की व्यवस्था

कल्याणकारी राज्य मुख्यतः आर्थिक सुरक्षा के विचार पर आधारित है। हमारा अब तक का अनुभव स्पष्ट करता है कि शासन का रूप चाहे कुछ भी हो, व्यवहार में राजनीतिक शक्ति उन्हीं लोगों के हाथों में केन्द्रित होती है, जो आर्थिक दृष्टि से शक्तिशाली होते हैं। अतः राजनीतिक शक्ति को जनसाधारण में निहित करने और जनसाधारण के हित में इसका प्रयोग करने के लिए आर्थिक सुरक्षा की व्यवस्था नितान्त आवश्यक है। लोककल्याणकारी राज्य के संदर्भ में आर्थिक सुरक्षा का तात्पर्य मुख्यतः निम्नलिखित तीन बातों से लिया जा सकता है –

  • सभी व्यक्तियों को रोजगार – ऐसे सभी व्यक्तियों को जो शारीरिक और मानसिक दृष्टि से कार्य करने की क्षमता रखते हैं, राज्य के द्वारा उनकी योग्यतानुसार उन्हें किसी न किसी प्रकार का कार्य अवश्य ही दिया जाना चाहिए। जो व्यक्ति किसी भी प्रकार का कार्य करने में असमर्थ हैं या राज्य जिन्हें कार्य प्रदान नहीं कर सका है उनके जीवन यापन के लिए राज्य द्वारा बेरोजगारी बीमे की व्यवस्था की जानी चाहिए।
  • न्यूनतम जीवन स्तर की गारण्टी – सभी लोगों को अपने कार्य के बदले में इतना पारिश्रमिक अवश्य ही मिलना चाहिए कि उसके द्वारा जीवन स्तर की प्राप्ति की जा सके। इस सम्बन्ध में अर्थशास्त्री क्राउथर ने कहा है कि “नागरिकों के लिए अधिकार रूप में उन्हें स्वस्थ बनाये रखने के लिए पर्याप्त भोजन की व्यवस्था की जानी चाहिए। निवास, वस्त्र आदि के न्यूनतम जीवन स्तर की ओर से उन्हें चिन्तारहित होना चाहिए। शिक्षा का उन्हें पूर्णतया समान अवसर प्राप्त होना चाहिए और बेरोजगारी, बीमारी तथा वृद्धावस्था के दुख से उनकी रक्षा की जानी चाहिए।” लोककल्याणकारी राज्य में किसी एक के लिए अधिकता के पूर्व सबके लिए पर्याप्त की व्यवस्था की जानी चाहिए।
  • अधिकतम समानता की स्थापना – सम्पत्ति और आय की पूर्ण समानता न तो सम्भव है और न ही वांछनीय तथापि आर्थिक न्यूनतम के पश्चात् होने वाली व्यक्ति की आय का उसके समाज सेवा सम्बन्धित कार्य से उचित अनुपात होना चाहिए। जहाँ तक संभव हो व्यक्तियों की आय के न्यूनतम और अधिकतम स्तर में अत्यधिक अन्तर नहीं होना चाहिए। इस सीमा तक आय की समानता तो स्थापित की ही जानी चाहिए कि कोई भी व्यक्ति अपने धन के आधार पर दूसरे का शोषण न कर सके।
कल्याणकारी राज्य

2. राजनीतिक सुरक्षा की व्यवस्था

कल्याणकारी राज्य की दूसरी विशेषता राजनीतिक सुरक्षा की व्यवस्था कही जा सकती है। इस प्रकार की व्यवस्था की जानी चाहिए कि राजनीतिक शक्ति सभी व्यक्तियों में निहित हो और ये अपने विवेक के आधार पर इस राजनीतिक शक्ति का प्रयोग कर सकें। इस लक्ष्य की प्राप्ति हेतु निम्न बातें आवश्यक हैं –

  • लोकतांत्रिक शासन – राजतंत्र, अधिनायकतंत्र या कुलीनतंत्र के अंतर्गत व्यक्ति अपने विवेक के आधार पर राजनीतिक कर्तव्यों का सम्पादन नहीं कर सकता क्योंकि इन शासन व्यवस्थाओं में उसके कोई राजनीतिक अधिकार होते ही नहीं हैं। लोककल्याणकारी राज्य में व्यक्ति के राजनीतिक हितों की साधना को भी आर्थिक हितों की साधना के समान ही समझा जाता है, अतः एक लोकतंत्रीय शासन व्यवस्था वाला राज्य ही लोककल्याणकारी राज्य हो सकता है।
  • नागरिक स्वतंत्रताएँ – किसी देश के संविधान द्वारा लोकतंत्रीय शासन की स्थापना कर देने मात्र से ही राजनीतिक सुरक्षा प्राप्त नहीं हो जाती व्यवहार में राजनीतिक सुरक्षा के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए नागरिक स्वतंत्रता का वातावरण होना चाहिए, अर्थात् नागरिकों को विचार अभिव्यक्ति और राजनीतिक दलों के संगठन की स्वतंत्रता प्राप्त नहीं होनी चाहिए। इन स्वतंत्रताओं के अभाव में लोकहित की साधना नहीं हो सकती और लोकहित की साधना के बिना लोककल्याणकारी राज्य आत्मा के बिना शरीर के समान होगा। पूर्व सोवियत रूस जैसे साम्यवादी राज्यों में नागरिकों के लिए नागरिक स्वतंत्रताओं और परिणामतः राजनीतिक सुरक्षा का अभाव होने के कारण उन्हें लोककल्याणकारी राज्य नहीं कहा जा सकता।
Welfare state

3. सामाजिक सुरक्षा की व्यवस्था

सामाजिक सुरक्षा का तात्पर्य सामाजिक समानता से है और इस सामाजिक समानता की स्थापना के लिए आवश्यक है कि धर्म, जाति, वंश, रंग, सम्पत्ति के आधार पर उत्पन्न भेदों का अन्त करके व्यक्ति के रूप में महत्व प्रदान किया जाय। डॉ. बेनीप्रसाद के शब्दों में, “सामाजिक समानता का सिद्धान्त इस मान्यता पर आधारित है कि प्रत्येक व्यक्ति के सुख का महत्व हो सकता है तथा किसी को भी अन्य किसी के सुख का साधन मात्र नहीं समझा जा सकता है।” वस्तुतः लोककल्याणकारी राज्य में जीवन के सभी पक्षों में समानता के सिद्धान्त को प्रतिष्ठित किया जाना चाहिए।

4. राज्य के कार्यक्षेत्र में वृद्धि

वास्तव में कल्याणकारी राज्य का सिद्धान्त व्यक्तिवादी विचार के विरुद्ध एक प्रतिक्रिया है और इस मान्यता पर आधारित है कि राज्य को वे सभी जनहितकारी कार्य करने चाहिए, जिनके करने से व्यक्ति की स्वतंत्रता नष्ट या कम नहीं होती। इसके द्वारा न केवल आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक सुरक्षा की व्यवस्था वरन् जैसा कि हॉब्सन ने कहा है, “डॉक्टर, नर्स, शिक्षक, व्यापारी, उत्पादक, बीमा कम्पनी के एजेण्ट, मकान बनाने वाले रेलवे नियंत्रक तथा सैकड़ों रूपों में कार्य किया जाना चाहिए।” आप कल्याणकारी राज्य विशेषताएं कार्य Hindibag पर पढ़ रहे हैं।

5. अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग की भावना

इन सबके अतिरिक्त एक लोककल्याणकारी राज्य अपने राज्य विशेष के हितों से ही सम्बन्ध न रखकर अन्तर्राष्ट्रीय होता है। वैज्ञानिक प्रगति तथा राजनीतिक चेतना के विकास ने विश्व के सभी देशों को एक-दूसरे के इतना निकट ला दिया है कि त्रस्त मानवता के बीच में अकेला राज्य अपना जीवन सुखपूर्वक व्यतीत नहीं कर सकता है। एक कल्याणकारी राज्य तो ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ अर्थात् ‘सम्पूर्ण विश्व ही मेरा कुटुम्ब है’ के विचार पर आधारित होता है। आप कल्याणकारी राज्य विशेषताएं कार्य Hindibag पर पढ़ रहे हैं।

कल्याणकारी राज्य के कार्य

कल्याणकारी राज्य के कार्य

राजनीति विज्ञान की परम्परागत विचारधारा राज्य के कार्यों को दो वर्गों (अनिवार्य तथा ऐच्छिक) में विभाजित करने की रही है और यह माना जाता रहा है कि अनिवार्य कार्य तो राज्य के अपने अस्तित्व को बनाये रखने के लिए किये जाने जरूरी हैं, किन्तु ऐच्छिक कार्य राज्य के हित में होते हुए भी राज्य के द्वारा उनका किया जाना तत्कालीन समय की विशेष परिस्थितियों और शासन के दृष्टिकोण पर निर्भर करता है,

लेकिन लोककल्याणकारी राज्य की धारणा के विकास के परिणामस्वरूप अनिवार्य और ऐच्छिक कार्यों की वह सीमा रेखा समाप्त हो गयी है और अब यह माना जाने लगा है कि परम्परागत रूप से ऐच्छिक कहे जाने वाले कार्य भी राज्य के लिए उतने ही आवश्यक हैं जितने कि अनिवार्य समझे जाने वाले कार्य लोककल्याणकारी राज्य के प्रमुख कार्य निम्न प्रकार हैं-

1. आन्तरिक सुव्यवस्था तथा विदेशी आक्रमणों से रक्षा

एक राज्य जब तक विदेशी आक्रमण से अपनी भूमि और सम्मान की रक्षा करने की क्षमता नहीं रखता और आन्तरिक शान्ति और व्यवस्था स्थापित रखते हुए व्यक्तियों को जीवन की सुरक्षा का आश्वासन नहीं देता, उस समय तक वह राज्य कहलाने का ही अधिकार नहीं है। इस कार्य को सम्पन्न करने के लिए राज्य सेना और पुलिस रखता है, सरकारी कर्मचारी तथा न्याय की व्यवस्था करता है और इन कार्यों से सम्बन्धित व्यय को पूरा करने के लिए नागरिकों पर कर लगाता है।

2. व्यक्तियों के पारस्परिक सम्बन्धों और राज्य एवं व्यक्तियों के सम्बन्धों की व्यवस्था

मानव एक स्वार्थी प्राणी है जिसके कारण उनकी पृथक-पृथक विचारशीलता से उनके विचारों और कार्यों में अन्तर पाया जाता है और किन्हीं प्रतिबन्धों के अभाव में विचारों और कार्यों का भेद संघर्ष का रूप ग्रहण कर सकता है। इसलिए राज्य के द्वारा व्यक्तियों के पारस्परिक सम्बन्धों का नियंत्रण किया जाता है। इसके लिए राज्य कानूनों का निर्माण करता है एवं पुलिस और न्यायालयों की सहायता से उन्हें कार्य में परिणत करता है।

इसके अतिरिक्त, वर्तमान समय में व्यक्ति एवं राज्य के सम्बन्धों को नियमित करना भी आवश्यक हो गया है और यह कार्य भी राज्य के द्वारा ही किया जाता है। राज्य का यह कार्य अधिक महत्वपूर्ण है और इस कार्य को भली-भाँति सम्पन्न करने पर ही व्यक्तियों की स्वतंत्रता एवं राज्य की सत्ता निर्भर करती है।

कल्याणकारी राज्य विशेषताएं

3. कृषि उद्योग तथा व्यापार का नियमन और विकास

लोककल्याणकारी राज्य के दायित्व एक ऐसे राज्य के द्वारा ही पूरे किये जा सकते हैं जो आर्थिक दृष्टि से पर्याप्त सम्पन्न हो, अतः इस प्रकार के राज्य के द्वारा कृषि, उद्योग तथा व्यापार के नियमन एवं विकास का कार्य किया जाना चाहिए। इसमें मुद्रा निर्माण, प्रामाणिक माप और तौल की व्यवस्था, व्यवसायों का नियमन, कृषकों को राजकोषीय सहायता, नहरों का निर्माण, बीज वितरण के लिए गोदाम खोलना और कृषि सुधार, इत्यादि विषय सम्मिलित हैं। राज्य के द्वारा जंगल आदि प्राकृतिक साधनों और सम्पत्ति की रक्षा की जानी चाहिए और कृषि तथा उद्योगों के बीच संतुलन स्थापित किया जाना चाहिए।

4. आर्थिक सुरक्षा सम्बन्धी कार्य

लोककल्याणकारी राज्य का एक अत्यन्त महत्वपूर्ण कार्य अपने नागरिकों को प्रदान करना है। आर्थिक सुरक्षा के अंतर्गत अनेक बातें सम्मिलित हैं, जिनमें सभी व्यक्तियों को रोजगार और अधिकतम समानता की स्थापना प्रमुख है। ऐसे व्यक्तियों को जो शारीरिक और मानसिक दृष्टि से कार्य करने की क्षमता रखते हैं, राज्य के द्वारा उन्हें उनकी योग्यता के अनुसार किसी न किसी प्रकार का कार्य अवश्य ही दिया जाना चाहिए।

जो व्यक्ति किसी भी प्रकार कार्य करने में असमर्थ हैं या राज्य जिन्हें कार्य नहीं प्रदान कर सका है उनके लिए राज्य द्वारा ‘जीवन निर्वाह भत्ते की व्यवस्था की जानी चाहिए। लोककल्याणकारी राज्य के द्वारा यद्यपि आय की पूर्ण समानता स्थापित नहीं की जा सकती, लेकिन जहाँ तक सम्भव हो, व्यक्तियों की आय के न्यूनतम स्तर में अधिक अन्तर नहीं होना चाहिए। इस सीमा तक आय की समानता तो स्थापित की ही जानी चाहिए कि कोई भी व्यक्ति अपने धन के आधार पर दूसरे का शोषण न कर सके।

अल्पविकसित देश

5. जनता के जीवन स्तर को ऊँचा उठाना

लोककल्याणकारी राज्य द्वारा नागरिकों को न्यूनतम जीवन स्तर गारंटी दी जानी चाहिए। ऐसी व्यवस्था की जानी चाहिए ताकि नागरिकों को अपने आपको स्वस्थ बनाये रखने के लिए पर्याप्त भोजन, वस्तु, नियम, शिक्षा और स्वास्थ्य की सामान्य सुविधाएँ अवश्य ही प्राप्त हों। इसके साथ ही राज्य के द्वारा नागरिकों के जीवन स्तर को उत्तरोत्तर ऊँचा उठाने का प्रयत्न किया जाना चाहिए।

6. शिक्षा और स्वास्थ्य सम्बन्धी कार्य

कल्याणकारी राज्य का एक मुख्य उद्देश्य व्यक्तियों के लिए उन सभी सुविधाओं की व्यवस्था करना होता है जो उनके व्यक्तित्व के विकास हेतु सहायक और आवश्यक हैं। इस दृष्टि से शिक्षा और स्वास्थ्य की सुविधा का विशेष उल्लेख किया जा सकता है। इस प्रकार का राज्य शिक्षण संस्थाओं की स्थापना करता है और एक निश्चित स्तर तक शिक्षा को अनिवार्य तथा निःशुल्क किया जाता है। औद्योगिक तथा प्राविधिक शिक्षा की व्यवस्था भी राज्य द्वारा की जाती है। इसी प्रकार चिकित्सागृहों तथा प्रसवगृहों आदि की स्थापना की जाती है जिनका उपयोग जनसाधारण निःशुल्क कर सकते हैं।

7. सार्वजनिक सुविधा सम्बन्धी कार्य

लोककल्याणकारी राज्य के द्वारा परिवहन, संचार साधन, रेडियो, सिंचाई के साधन, बैंक, विद्युत, कृषि के वैज्ञानिक साधनों आदि की व्यवस्था से सम्बन्धित सार्वजनिक सुविधा के कार्य किये जाते हैं। यद्यपि इन सुविधाओं के लिए राज्य द्वारा शुल्क प्राप्त किया जाता है, किन्तु इन सुविधाओं का महत्व इस दृष्टि से है कि व्यक्ति अपने लिए इन साधनों की व्यवस्था नहीं कर सकता, साधनसम्पन्न राज्य ही कर सकता है।

इसके अतिरिक्त, इन सुविधाओं के लिए राज्य द्वारा उचित शुल्क ही प्राप्त किया जाता है और जो कुछ लाभ होता है, वह सार्वजनिक कोष में जाता है तथा उसका उपयोग भी स्वाभाविक रूप से अधिक सार्वजनिक सुविधाएँ प्रदान करने के लिए ही किया जाता है।

रागदरबारी उपन्यास व्याख्या

8. समाज सुधार

राज्य का लक्ष्य व्यक्तियों का न केवल आर्थिक वरन् सामाजिक कल्याण भी होता है। इस दृष्टि से राज्य के द्वारा मद्यपान, बाल-विवाह, छुआछूत, जाति-व्यवस्था आदि परम्परागत सामाजिक कुरीतियों को दूर करने के उपाय किये जाने चाहिए।

9. आमोद-प्रमोद की सुविधाएँ

लोककल्याणकारी राजव्यवस्था में जनता को स्वस्थ मनोरंजन की सुविधाएं प्रदान करने के लिए राज्य के द्वारा सार्वजनिक उद्यानों, क्रीड़ा क्षेत्रों, सार्वजनिक तरण तालों, सिनेमागृहों, रंगमंच, रेडियो आदि का प्रबन्ध करना चाहिए।

10. नागरिक स्वतंत्रताओं की व्यवस्था

कल्याणकारी राज्यों के द्वारा अपने सभी नागरिकों को विचार अभिव्यक्ति, सम्मेलन, संगठन आदि की स्वतंत्रता प्रदान की जानी चाहिए, जिससे लोकतांत्रिक आदर्श की व्यावहारिक प्राप्त सम्भव हो सके।

11. अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र के कार्य

लोक कल्याण का आदर्श किसी एक राज्य विशेष से नहीं वरन् समस्त मानवता से सम्बन्ध रखता है, अतः एक लोककल्याणकारी राज्य द्वारा अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र के अंतर्गत युद्ध ही नहीं वरन् अधिकारिक राज्यों के साथ सद्भावना और सहयोग का मार्ग अपनाया जाना चाहिए। अपने अस्तित्व और सीमाओं या सम्मान की रक्षा के लिए उनके द्वारा शक्ति का प्रयोग किया जा सकता है, किन्तु राजनीतिक या आर्थिक स्वार्थों की पूर्ति हेतु उसके द्वारा अन्य किसी राज्य के विरुद्ध बल प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए।

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