औपचारिक सामाजिक नियंत्रण

औपचारिक सामाजिक नियंत्रण से आशय ऐसे नियंत्रण से लगाया जाता है जो राज्य सरकार या किन्हीं औपचारिक संस्थाओं द्वारा अपने सदस्यों के व्यवहारों को नियंत्रित करने के लिए स्पष्ट या परिभाषित नियमों के द्वारा लागू किया जाता है और यह नियम सदस्यों पर अनिवार्य रूप से लागू होते हैं। जो सदस्य इन नियमों का पालन नहीं करते हैं, उन्हें विधान के नियमों द्वारा दंडित किया जाता है। दूसरे शब्दों में यह कहा जाता है कि इन नियमों में बाध्यता का तत्व पाया जाता है।

औपचारिक सामाजिक नियंत्रण की विशेषताएँ

औपचारिक सामाजिक नियंत्रण की विशेषताएं निम्नलिखित हैं-

  1. बाध्य करने वाला प्रभाव – सामाजिक नियंत्रण के अंतर्गत सभी व्यक्ति कानून या नियमों का पालन करने के लिए बाध्य होते हैं। इनका उल्लंघन करने वालों को दंडित किया जाता है। कानून का पालन कराने के लिए सरकार या राज्य के पास विशिष्ट शक्तियाँ होती हैं जिनके माध्यम से कानूनों का पालन करवाया जाता है।
  2. औपचारिक नियंत्रण का सम्वन्ध व्यक्ति के बाह्य पक्ष से होता है – इसके अंतर्गत व्यक्ति कानून या नियमों के अनुरूप व्यवहार करने के लिए विवश होता है। इसलिए व्यक्ति दंड के भय से कानून का पालन करते हैं। भय के कारण कानून का पालन करने वाले व्यक्ति भय खत्म होते ही पुनः अनियंत्रित व्यवहार करने लगते हैं इसीलिए यह कहा जा सकता है औपचारिक सामाजिक नियंत्रण का संबंध व्यक्तित्व के बाह्य पक्ष से होता है।
  3. औपचारिक संस्थाओं द्वारा लागू – औपचारिक नियंत्रण समाज की औपचारिक संस्थाओं द्वारा लागू किये जाते हैं। ये संस्थायें राज्य सरकारें या अन्य औपचारिक संस्थायें होती हैं। इन संस्थाओं द्वारा कुछ नियम अथवा कानून बनाये जाते हैं जो स्पष्ट रूप से परिभाषित होते हैं।
  4. नियम के विपरीत व्यवहार करने पर दंड की व्यवस्था – औपचारिक नियंत्रण के अंतर्गत नियम के विरुद्ध आचरण करने पर दंड की व्यवस्था की जाती है।
  5. जटिल समाजों से विशेष सम्बन्ध – औपचारिक नियंत्रण के साधनों की सबसे अधिक आवश्यकता जटिल समाजों में होती है। आज के औद्योगिक एवं नगरीय समाज में द्वतीयक संबंधों की प्रधानता है, जिनमें अनौपचारिक नियंत्रण के साधन कारगर नहीं होते, फलतः न्यायालय, जेल, पुलिस एवं कानून का सहारा लेना पड़ता है।
  6. अनुकूलता अथवा परिवर्तनशीलता – औपचारिक नियंत्रण के साधनों की यह एक प्रमुख विशेषता होती है कि समाज के अनुकूल न होने पर इसमें परिवर्तन के द्वारा अनुकूलता लायी जा सकती है।
  7. पूर्णरूप से विचार करने के बाद लागू करना – औपचारिक नियंत्रण के साधनों की यह प्रमुख विशेषता होती है कि इन्हें पूर्ण रूप से सोच विचार कर सभी पक्षों से राय लेकर लागू किया जाता है। इन्हें बिना विचारे लागू करने पर समाज में संघर्ष होने लगते हैं।

औपचारिक सामाजिक नियंत्रण के साधन

औपचारिक सामाजिक नियंत्रण के साधन निम्नलिखित हैं-

  1. राज्य – राज्य के पास प्रभुसत्ता एवं शासन व्यवस्था होती है। राज्य राजकीय कर्मचारियों के द्वारा लोगों से कानून का पालन करवाता है। राज्य के पास कानून का पालन न करने वालों के विरुद्ध कार्यवाही का भी अधिकार होता है इसलिए दंड के भय से व्यक्ति कानून तोड़ने का साहस नहीं करते।
  2. कानूनसमाज के विभिन्न औपचारिक संगठनों द्वारा अनेक कानून बनाये जाते हैं ताकि समाज के सभी वर्गों को नियंत्रित किया जा सके। कानूनों का यह प्रमुख गुण होता है कि यह व्यक्ति के अधिकारों एवं दायित्वों को स्पष्ट रूप से निर्धारित करता है।
  3. शिक्षण संस्थान – विभिन्न शिक्षण संस्थान जैसे स्कूल, कालेज, विश्वविद्यालय, औपचारिक नियंत्रण के साधन हैं। प्रत्येक शिक्षण संस्थान में उससे संबंधित कुछ नियम होते हैं जिनका पालन करना वहाँ के विद्यार्थियों का कर्त्तव्य होता है। इनका पालन न करने वाले विद्यार्थियों को दंडित किया जाता है। इसके दोहरे लाभ होते हैं पहला तो यह कि विद्यार्थियों का विद्यार्थी जीवन सफल होता है। दूसरा भावी जीवन के लिए अनुशासन की नींव मजबूत होती है।
  4. जेल – न्यायालय द्वारा दंडित किये गये व्यक्तियों को जेल में रखा जाता है। जेल में सजा काट रहे व्यक्ति अपने मित्र, परिचित, रिश्तेदार, परिवार आदि से विलग हो जाते हैं। यह पृथक्करण व्यक्ति के लिए काफी दुखदायी होता है। जेल में उसे शारीरिक और मानसिक कष्ट भोगने पड़ते हैं। इसलिए जेल के भय से व्यक्ति कानून के विरुद्ध जाने का साहस नहीं करते।
  5. पुलिस एवं अदालत – राज्य की पुलिस भी औपचारिक नियंत्रण में महत्वपूर्ण निभाती है। पुलिस जिन तत्वों को विधि-विरुद्ध आचरण करने पर पकड़ती है, उन पर अदालत में मुकदमा चलाया जाता है और अपराधी सिद्ध होने पर दंड दिया जाता है। यह दंड विभिन्न रूपों जैसे, जुर्माना, कारावास, मृत्युदंड आदि के रूप में होता है। इन पीड़ादायी स्थितियों से बचने के लिए व्यक्ति कानून की अवज्ञा नहीं करते और अपने व्यवहार को सन्तुलित रखते हैं।

औपचारिक सामाजिक नियंत्रण की प्रविधियां

औपचारिक सामाजिक नियंत्रण की प्रविधियाँ निम्नलिखित हैं-

  1. जुर्माना (अर्थदंड) – जुर्माना एक कारगर औपचारिक नियंत्रण प्रविधि है। इसमें यह पहले से ही निर्धारित रहता है कि किस कानून का उल्लंघन करने पर कितना जुर्माना देना पड़ेगा।
  2. चेतावनी – यह प्राचीन और प्रारम्भिक प्रविधि है। इसके अंतर्गत व्यक्ति को विधि का थोड़ा सा उल्लंघन करने पर विशेष दंड न देकर क्षमा कर दिया जाता है और भविष्य में ऐसा न करने का वचन ले लिया जाता है। क्षमा मांगने और वचन देने पर व्यक्ति को चेतावनी देकर मुक्त कर दिया जाता है।
  3. इनाम – समाज के विभिन्न संगठन अपने सदस्यों को अच्छे कार्य करने पर पुरस्कृत करते हैं। इन पुरस्कारों से व्यक्ति अच्छे कार्य करने की प्रेरणा प्राप्त करते हैं। पुरस्कृत होने की आकांक्षा व्यक्ति को निन्दनीय कार्य करने से रोकती है और अनुशासित रहने की भावना उत्पन्न करती है। (औपचारिक सामाजिक नियंत्रण)
  4. खुफिया व्यवस्था – खुफिया व्यवस्था सरकारी और गैर सरकारी दोनों प्रकार की हो सकती है। इस व्यवस्था में गुप्तचर या खुफिया अधिकारी आम वेशभूषा में लोगों के बीच रहते हैं तथा राष्ट्र विरोधी एवं समाज विरोधी व्यक्तियों, अपराधों कार्यों एवं साजिशों पर नजर रखते हैं। इन गुप्तचर कर्मियों की सूचनाओं के आधार पर राष्ट्र विरोधी तत्वों को अपराध करने से पूर्व ही पकड़ लिया जाता है। खुफिया विभाग के भय से अपराधी अपराध करने से डरते हैं।
  5. जेल या कारावास – इसके अंतर्गत व्यक्ति को जेल या कारावास में रहना पड़ता है। व्यक्ति को सक्षम व्यक्ति को सक्षम कारावास और बिना श्रम के कारावास का दंड दिया जाता है। सक्षम कारावास काट रहे अपराधियों से जेल में कठिन परिश्रम करवाया जाता है। बिना श्रम के कारावास में शारीरिक श्रम तो नहीं करना पड़ता मगर मानसिक कष्ट तो सहना ही पड़ता है।
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