उपयोगिता

सामान्य बोलचाल की भाषा में उपयोगिता का अर्थ किसी वस्तु के उपयोग या प्रयोग से मिलने वाले लाभ से लगाया जाता है, परन्तु अर्थशास्त्र में इस शब्द का अर्थ सामान्य अर्थ से कुछ अलग तथा व्यापक होता है। अर्थशास्त्र में उपयोगिता किसी वस्तु की क्षमता अथवा वह गुण है जिससे मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति होती है। Utility लाभकारक भी हो सकती है और हानिकारक भी हो सकती है।

उपयोगिता के प्रकार

  1. सीमांत उपयोगिता – यह उस अतिरिक्त उपयोगिता को बताती है जो किसी वस्तु की एक अतिरिक्त इकाई का उपयोग करने से उपभोक्ता को प्राप्त होती है। दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि जब कोई व्यक्ति किसी वस्तु का उपभोग करता है तो एक के बाद दूसरी दूसरी के बाद तीसरी का उपभोग करता जाता है।
  2. कुल उपयोगिता – कुल उपयोगिता से आशय सतुष्टि की उस मात्रा से लगाया जाता है जो वस्तु की निश्चित मात्रा के उपभोग से प्राप्त होती है। दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है किसी वस्तु की विभिन्न इकाई के उपभोग से जो Utility प्राप्त होती है उसके कुल योग के कुल उपयोगिता कहते हैं। इस संबंध में प्रो० मेयर ने निम्नलिखित परिभाषा को दी है-

“कुल उपयोगिता संतुष्टि की वह मात्रा है जोकि वस्तु की निश्चित मात्रा के उपयोग से उसके स्वामित्व से प्राप्त होती है।”

मेयर

उपयोगिता की विशेषताएँ

उपयोगिता की प्रमुख विशेषतायें निम्नलिखित है-

  1. अमूर्त: – Utility अमूर्त होती है अर्थात इसका कोई भौतिक स्वरूप नहीं होता है। इसे न तो देखा जा सकता है और न ही स्पर्श किया जा सकता है। इसे केवल महसूस किया जा सकता है।
  2. आत्मनिष्ठ धारणा – उपयोगिता एक आत्मनिष्ठ धारणा है। यह किसी वस्तु का निजी गुण न होकर एक मनोवैज्ञानिक विचार है जो उपभोक्ता की मानसिक स्थिति पर निर्भर करता है।
  3. नैतिकता से सम्बन्धित नहीं – उपयोगिता का नैतिकता से कोई सम्बन्ध नहीं होता है अर्थात विभिन्न वस्तुओं के उपभोग में आर्थिक दृष्टि से तो उपयोगिता होती है, किन्तु यह सामाजिक मान्यताओं से अनैतिक या कानूनी दृष्टि से गलत होता है।

उपयोगिता ह्रास नियम

इस नियम का प्रतिपादन सर्वप्रथम हरमैन हैनरिक गौर्सन ने किया था। उन्हीं के विचार को मार्शल ने विकसित रूप में प्रस्तुत किया। गौसेन के शब्दों में, “जब हम किसी एक सन्तुष्टि का बिना किसी व्यवधान के लगातार प्रयोग करते रहते हैं तो उस संतुष्टि की मात्रा तब तक निरन्तर घटती है जब तक कि उससे पूर्ण तृप्ति की प्राप्ति नहीं हो पाती।” यह नियम निम्नलिखित दो तथ्यों पर आधारित है-

  1. व्यक्ति की इच्छाएँ अनन्त हैं, परन्तु प्रत्येक इच्छा को तृप्त किया जा सकता है। जैसे-जैसे व्यक्ति किसी वस्तु की इकाइयों का प्रयोग बढ़ाता जाता है. उसकी इच्छा की तीव्रता कम होती जाती है. और उपभोक्ता पूर्ण संतुष्टि के स्तर तक पहुँच जाता है जहाँ उसके लिए वस्तु की सीमान्त उपयोगिता शून्य हो जाती है।
  2. विभिन्न वस्तुएँ अपूर्ण स्थानापन्न होती है। अतः वस्तुओं को एक निश्चित अनुपात में प्रयोग किया जा सकता है।
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