उदारवादी विचारधाराएं

1885 से लेकर 1905 तक भारतीय आन्दोलन का नेतृत्व उदारवादी राष्ट्रवादियों के हाथों में था। जिन्होंने कांग्रेस के माध्यम से कार्य करते हुए सरकार के समक्ष अपनी माँगे रखी। बहुत से इतिहासकारों की दृष्टि में उदारवादी युग का भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन के इतिहास में कोई विशेष महत्व नहीं है। कारण यह है कि उदारवादी अपने उद्देश्य की प्राप्ति में सफल न रहे। इसके अलावा उनका लक्ष्य स्पष्ट नहीं था तथा उनके कार्यक्रमों और कार्य प्रणालियों में बहुत-सी त्रुटियाँ थी।

उदारवादियों की सफलताएं

उदारवादियों ने भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन को निम्नलिखित महत्वपूर्ण तथ्य प्रदान किये हैं-

  1. भारतीय राष्ट्रीयता के जनक कांग्रेस के उदारवादी नेता ही भारतीय राष्ट्रीयता के जनक है। सबसे पहले उन्होंने ही साम्प्रदायिकता तथा प्रांतीयता जैसी संकीर्ण भावनाओं से ऊपर उठकर भारतीय राष्ट्रीयता का नारा बुलन्द किया।
  2. राजनीतिक शिक्षा उदारवादी आन्दोलन के कारण भारत के भिन्न-भिन्न कोने के लोगों में पारस्परिक सम्पर्क हुआ तथा उनके बीच राजनीतिक विचारों का आदान-प्रदान होने लगा।
  3. भारतीय परिषद् अधिनियम 1892 उदारवादियों ने प्रशासन में सुधार लाने के उद्देश्य से सरकार के सामने अनेक मोंगे प्रस्तुत की। उनकी माँगों के सीमित अंश को पूरा करने के लिए ब्रिटिश सरकार ने 1892 में एक अधिनियम पारित किया।
  4. भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम का आधार भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम की नींव देने का श्रेय उदारवादी युगनेताओं को है।

भारतीय उदारवादियों के योगदान

भारतीय उदारवादियों का योगदान निम्नलिखित बिन्दुओं द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है –

संवैधानिक साधनों में विश्वास

उदारवादी संवैधानिक साधनों के मार्ग को ग्रहण करने पर बल देते थे। उन्होंने वैधानिक सुधारों में अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए प्रार्थना पत्रों, स्मृति पत्रों और प्रतिनिधि मण्डलों के मार्ग को अपनाया था। इस हेतु एक ओर तो भाषणों, बैठकों तथा मोंगो और प्रस्तावों तथा समाचार पत्रों के माध्यम से सरकार के गुण-दोषों के विवेचन के द्वारा जनमत को जाग्रत करने का कार्य किया तो दूसरी ओर सरकार को अनेक प्रार्थना पत्रो, स्मरण पत्रों आदि के द्वारा सरकार पर दबाव डालकर इच्छित परिवर्तन लाने हेतु प्रभावित किया।

धर्मनिरपेक्षता

उदारवादियों ने धर्मनिरपेक्षता का विचार प्रस्तुत किया। गोखले आदि सभी विद्वान संकीर्णता से ऊपर उठे हुए थे. उन्होंने हिन्दू मुस्लिम एकता का समर्थन किया। दोनों को सहिष्णुता का पाठ पढ़ाया। श्री रमेशचन्द्र बरमानी के अनुसार “इस दौर के राष्ट्रीय आन्दोलन की एक अन्य विशेषता इसके सामाजिक आधार की संकीर्णता रही। व्यापक स्तर पर जनता इसके प्रति आकर्षित नहीं हुई तथ इसका प्रभाव शहरी क्षेत्र के शिक्षित और हिन्दू भारतीयों तक सीमित था। अन्य समुदायों जैसे सौदागरों, जमींदारों तथा कृषक वर्ग ने इसमें कोई दिलचस्पी नहीं दिखायी।

आर्थिक न्याय

उदारवादियों में दादाभाई नौरोजी जैसे प्रमुख अर्थशास्त्री भी थे। इन्होंने भारत के विकासशील पूंजीवादी हितों का प्रतिफलन भी किया तथा साम्राज्यवाद का आर्थिक विवेचन करते हुए स्पष्ट किया कि ब्रिटेन के आर्थिक साम्राज्यवाद का मूल उद्देश्य भारतीय अर्थव्यवस्था को ब्रिटिश अर्थव्यस्था के अधीन रखना है। इन्होंने औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था की स्थापना के प्रयत्नों का विरोध किया तथा अपने भाषणों में निरन्तर भारत के आर्थिक शोषण की ओर जनता का ध्यान दिलाया।

राष्ट्रीय आन्दोलन में राष्ट्रीयता का विकास

कांग्रेस के कार्य का लोक शिक्षण के लिए बहुत बढ़ा महत्व था। सार्वजनिक कार्यों में दिलचस्पी लेने वालों की संख्या बढ़ रही थी और राष्ट्रीय महत्व प्रश्नों पर जनमत तैयार हो रहा था। सरकार के कार्यों पर ध्यान रखा जाता था और 1901 से 1905 तक के वर्षों में उसके प्रति प्रबल विरोध उठ खड़ा हुआ था। उदारवादी नेताओं ने भारतीयों में सामान्य राष्ट्रीयता उत्पन्न करने में कठिन परिश्रम किया।

समाज सुधार

उदारवादी नेता रानाडे समाज सुधार के समर्थक थे। उन्होंने पुनर्विवाह किवा विवाह हेतु संघ की स्थापना की। नारी जागृति को रानाडे जी सामाजिक प्रगति तथा राजनैतिक मुक्ति की प्रथम कड़ी मानते थे। नौरोजी जैसे अर्थशास्त्री ने मजदूर वर्ग के संगठन के प्रयास भी किये।

भारतीयों की राजनैतिक शिक्षा

उदारवादियों ने राजनैतिक शिक्षा दी। भारतीयों का प्रजातान्त्रि आदशों के प्रति मोह बढ़ा। प्रतिवर्ष दिसम्बर के अन्त में शिक्षित भारतीय, जिनका राजनीतिक काम में और राष्ट्रीयता के निर्माण में अनुराग था। क्रम से प्रत्येक प्रान्त के किसी महत्वपूर्ण नगर में एकत्रित होते लोग राष्ट्रीय महत्व के प्रश्नों पर विशेषकर शासन, शिक्षा एवं अर्थव्यवस्था सम्बन्धी विषयो पर विचार विनिमय करते थे और अपने दृष्टिकोण को विनीत, तर्कयुक्त एवं राजभक्ति भाषा में लिखे हुए प्रस्तावो द्वारा व्यक्त करते थे।

बाद के भारतीय स्वतन्त्रता संघर्ष हेतु आधार तैयार करना

उदारवादियों ने अनजाने में ही पूर्ण स्वाधीनता की इमारत का शिलान्यास कर दिया। पूर्ण स्वाधीनता की माँग यद्यपि बहुत बाद में की गयी • लेकिन इस माँग का सूत्र तो उदारवादियों के कार्यों से जुड़ा हुआ था। इस काल के नेताओं ने आगे के स्वतन्त्रता संघर्ष के लिए प्रमुख रूप से निम्न आधार खड़े किये, जिन पर स्वतन्त्रता आन्दोलन के निम्न कदम रखे गये।

  1. विदेशी का बहिष्कार और स्वदेशी को अपनाना बंगाल के प्रतिनिधियों ने इस पर जोर दिया, गोखले ने इसे अन्तिम हथियार के रूप में काम में लाने के लिए सहमति दी। स्वदेशी में उन्होंने हथकरघा उद्योग अपनाने की बात कही।
  2. असहयोग गोखले ने 1905 में बनारस में कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशन में अपने अध्यक्षीय भाषण में लार्ड कर्जन की नीतियों के अन्तर्गत कहा कि “यदि लोगों को इस प्रकार अपमानित किया जाता है और उन्हें ही निःसहाय बनाते रहना है तो मैं यही कहूँगा कि लोकहित के शासनतन्त्र के साथ किसी भी प्रकार का सहयोग करने की आशा को अंतिम नमस्कार है।’ उदारवादियों ने भारतीय जनता को आधुनिक शिक्षा में शिक्षित करने, राष्ट्रवादी राजनैतिक चेतना को विकसित करने तथा राजनैतिक प्रश्नों पर एक संगठित जनमत तैयार करने की दिशा में सर्वोष्कृट योगदान दिया।

ब्रिटिश सरकार के प्रति निष्ठा

इस काल में भारतीय नेता देशभक्त और विद्वान होने के द साथ-साथ ब्रिटिश शासन की अंग्रेजी संस्थाओं, भाषा, सभ्यता और साहित्य आदि के बहुत प्रशंसक थे। ब्रिटिश शासन को वे वरदान और उपकार के रूप में देखते थे और ब्रिटिश सरकार के प्रति वफादार थे।

क्रमिक सुधारों में विश्वास

उदार राष्ट्रवादी क्रांतिकारी परिवर्तनों में विश्वास नहीं करते थे। वे चाहते थे कि राजनीतिक प्रशासकीय क्षेत्र में धीरे-धीरे सुधार लाया जाये। उसका प्रमुख उद्देश्य प्रशासन, परिषदों, नौकरियों, स्थानीय संस्थाओं, रक्षा सेनाओं आदि में सुधार करवाना था। 1906 में कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में दादाभाई नौरोजी ने स्वराज की माँग की और वह भी ब्रिटिश साम्राज्य की छत्रछाया मे यह भी स्वीकार किया गया कि इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए लम्बी अवधि तक भारतीयों को प्रशिक्षण की आवश्यकता है।

अतः उदारवादी नेता किसी भी प्रकार के क्रांतिकारी परिवर्तन के विरुद्ध थे। उदारवादी राष्ट्रीय नेताओं ने इस बात को स्वीकार किया था कि भारत तब इंग्लैण्ड, कनाडा, आस्ट्रेलिया जैसे पूर्ण प्रतिनिध्यात्मक शासन के लिए तैयार न था, अतः भारत जैसे देश में धीरे-धीरे लोकतान्त्रिक संस्थाओं का विकास चाहते थे। तात्कालिक परिवर्तन के रूप में वे प्रशासन में आवश्यक सुधार विधायी परिषदों, सेवाओं, स्वायत्त संस्थाओं, रक्षा सेवाओं आदि में सुधार तथा भारतीयों का अधिक भाग ही चाहते थे।

अंग्रेजों की न्यायप्रियता में विश्वास

उदारवादी पक्ष के अधिकांश कांग्रेसी नेताओं को अंग्रेजो की सत्यता और न्यायप्रियता में विश्वास था। उनके विचार में अंग्रेज स्वतन्त्रता प्रेमी है और यदि उन्हें भारतीयों की योग्यता पर विश्वास हो जाये तो वे उन्हें स्वशासन बिना किसी सोच-विचार के दे सकेंगे। यही कारण था कि कांग्रेस शुरू से ही अंग्रेजी सरकार की सहानुभूति तथा ब्रिटिश जनमत के समर्थन को जीतने के लिए प्रयास करती रही।

सर फिरोजशाह मेहता ने 1890 में कहा था कि मुझे इस बात में तनिक भी संदेह नहीं है कि ब्रिटिश राजनीतिज्ञ अन्त में जाकर हमारी पुकार पर अवश्य ध्यान देंगे। सर टी. माधव राव ने कांग्रेस के तीसरे अधिवेशन के अवसर पर कहा था कि कांग्रेस ब्रिटिश शासन का सर्वोच्च शिखर और ब्रिटिश जाति का कीर्ति मुकुट है।”

राजनीतिक स्वशासन की प्राप्ति

उदारवादी नेता केवल कतिपय प्रशासनिक सुधार ही नहीं चाहते थे, बल्कि उनका लक्ष्य भारतीयों के लिए स्वशासन की प्राप्ति भी थी। ब्रिटिश शासन के अन्तर्गत स्वशासन की स्थापना चाहते थे। उनके विचार में ब्रिटिश शासन के अन्तर्गत भारतीयों को स्वशासन का पर्याप्त प्रशिक्षण प्राप्त हो चुका था। भारत स्वशासन के लिए पूर्ण तैयार था। स्वशासन के महत्व के सम्बन्ध में श्रीमती एनी बेसेट ने कहा था कि स्वतन्त्र संस्थाएं मानसिक और नैतिक अनुशासन की सर्वोच्च शिक्षण संस्थाएँ हैं।

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