उत्पादन फलन

उत्पादन फलन – एक दी हुई तकनीक के अंतर्गत उपादानों के विभिन्न संयोग एवं उनसे प्राप्त होने वाले उत्पादनों के भौतिक सम्बन्ध को उत्पादन फलन कहा जाता है। उत्पादन फलन से यह पता चलता है कि एक निश्चित अवधि में उपादानों के परिवर्तन से उत्पादन आकार में किस तरह और कितनी मात्रा में परिवर्तन होता है। इस प्रकार उपादानों की मात्रा और उत्पादन की मात्रा के भौतिक सम्बन्ध को उत्पादन फलन कहा जाता है। उत्पादन फलन केवल भौतिक मात्रात्मक सम्बन्धों पर आधारित है। इसमें मूल्यों का समावेश नहीं किया जाता।

उत्पादन फलन का अभिप्राय फर्म के उचित साधनों और प्रति समय इकाई वस्तुओं और सेवाओं के बीच का भौतिक सम्बन्ध है जबकि मूल्यों को छोड़ दिया जाए।

प्रो० लेफ्टबिच के शब्दों में

उत्पादन फलन की विशेषताएँ

  1. उत्पादन फलन उत्पत्ति के साधनों एवं उत्पादन के भौतिक मात्रात्मक सम्बन्ध को बताता है। उत्पादन फलन वास्तव में एक अभियांत्रिक धारणा है।
  2. उत्पादन फलन में उपादानों एवं उत्पादन के मूल्यों का कोई समावेश नहीं होता। उत्पादन फलन मूल्यों से स्वतंत्र होता है।
  3. उत्पादन फलन का सम्बन्ध एक समयावधि से होता है। एक समय में एक उत्पादन फलन हो सकता है जो समय बदलने पर बदल सकता है।
उत्पादन फलन

उत्पादन फलन की मान्यताएँ

  1. उत्पादन फलन का सम्बन्ध निश्चित समयावधि से होता है।
  2. उत्पादन फलन के सभी उपादान अल्पकाल में परिवर्तित नहीं किए जा सकते अर्थात् अल्पकाल में कुछ साधन स्थिर तथा कुछ साधन परिवर्तनशील होते हैं।
  3. दीर्घकाल में सभी साधन परिवर्तनशील होते हैं।
  4. तकनीकी स्तर में परिवर्तन नहीं होता तथा फर्म सर्वश्रेष्ठ तकनीक अपनाती है।
  5. उत्पत्ति के साधनों को छोटी-छोटी इकाइयों में विभाजित किया जा सकता है।

उत्पादन फलन के प्रकार

उत्पादन फलन मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं

  1. स्थिर अनुपात उत्पादन फलन – स्थिर अनुपात उत्पादन फलन में समस्त आदानों का प्रयोग स्थिर अनुपात में किया जाता है।
  2. परिवर्तनीय अनुपात उत्पादन फलन – परिवर्तनीय उत्पादन फलन में उत्पादन का तकनीकी गुणांक स्थिर न होकर परिवर्तनीय होता है। इसके अंतर्गत आवश्यक उत्पादन के साधनों के अनुपातो को एक दूसरे से प्रतिस्थापित करके परिवर्तित किया जा सकता है।
उत्पादन फलन की विशेषताएं

अल्पकालीन उत्पादन फलन

अल्पकालीन उत्पादन फलन अल्पकाल में उत्पत्ति साधनों और उत्पादन मात्रा के तकनीकी संबंध को दर्शाता है। इस काल में एक अथवा दो साधनों की मात्रा में ही परिवर्तन किया जा सकता है तथा अन्य साधनों की मात्रा स्थिर रहती है। इस काल में अधिकांश साधनों की पूर्ति बेलोचदार होती है। ये निम्नलिखित दो प्रकार के होते हैं –

  1. एक परिवर्तनशील साधन सहित उत्पादन फलन
  2. दो परिवर्तनशील साधन सहित उत्पादन फलन

दीर्घकालीन उत्पादन फलन

दीर्घकाल से आशय उस समयावधि से है जिसमे साधनों में आवश्यकतानुसार परिवर्तन किये जा सकते हैं। दीर्घकाल उत्पादन फलन में उत्पत्ति के साधनों की लोच की अवस्था को स्वीकार किया जाता है। दीर्घकालीन उत्पादन फलन की भी तीन स्थितियों स्पष्ट हो जाती है। इन्हें पैमाने के प्रतिफल के नाम से भी जाना जाता है। पहली जब उत्पादन वृद्धि साधन वृद्धि से अधिक अनुपात में होती है। आप उत्पादन फलन Hindibag पर पढ़ रहे हैं।

उत्पादन फलन के प्रकार

इसे पैमाने के बढ़ते हुए प्रतिफल की संज्ञा दी जाती है। दूसरी, जब उत्पादन वृद्धि समान अनुपात में होती है। इसे पैमाने के स्थिर प्रतिफल कहते हैं। तीसरी, जब उत्पादन वृद्धि साधन वृद्धि से कम अनुपात में होती है। इसे पैमाने के घटते प्रतिफल की अवस्था कहते हैं। दीर्घकालीन उत्पादन फलन का निर्माण सभी साधनों को परिवर्तनीय मानकर किया जाता है। इसमें साधनों का स्थिर और परिवर्तनशील होने का अन्तर समाप्त हो जाता है।

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