उत्तर व्यवहारवाद

व्यवहारवाद का आशय एक ऐसी क्रान्ति से है जो उस ‘व्यवहारवाद’ के विरुद्ध है, जिसके द्वारा राजनीतिक विज्ञान को प्राकृतिक विज्ञान की वैज्ञानिक शोध पद्धति का प्रयोग करके विज्ञान का रूप देने का प्रयास किया है।

“व्यवहारवादी क्रान्ती से हम अपने विश्लेषण को सार्थकता नहीं दे सकते, अतः हमें उत्तर व्यवहारवादी बनना होगा।’

– डेविड ईस्टन

उत्तर व्यवहारवाद के आधारभूत लक्षण

व्यवहारवाद के आधारभूत लक्षण या मान्यतायें डेविड ईस्टन के अनुसार निम्नलिखित हैं

सामाजिक परिवर्तन पर बल

व्यवहारवाद में साधारण परिवर्तनों से सम्बन्धित रूढ़िवादी विचारधारायें विद्यमान है। उत्तरव्यवहारवाद व्यापक मूल्यों के सम्बन्ध में परिवर्तन का समर्थक है। उत्तर व्यवहारवाद के विचारकों का यह मानना है कि जाने अनजाने व्यवहारवादी परिवर्तन विरोधी हो जाते हैं। परिवर्तन विरोध व्यवहारवाद के प्रणालीशास्त्र में निहित है। व्यवहारवादी तथ्यों के विश्लेषण एवं वर्णन तक अपने को सीमित रखता है।

उन तथ्यों के विस्तृत सम्बन्ध को, उनकी सामाजिक प्रासंगिकता को समझने की आवश्यकता पर विशेष ध्यान नहीं देता है, क्योंकि उसे यह ज्ञात है कि उसके प्रणालीशास्त्र के अंतर्गत यह वर्जित है। इसलिये वह व्यापक संदर्भ में उदासीन ही रहता है। जिसके फलस्वरूप व्यवहारवादी राजनीति विज्ञान ने एक ऐसी सामाजिक रूढ़िवादिता की विचारधारा का रूप धारण कर लिया था जिससे वह केवल मन्द गति से ही परिवर्तित हो सकते थे।

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प्रविधि से पूर्व सार

उत्तर व्यवहारवाद के विचारकों का मानना है कि व्यवहारवादी तकनीक को विषय-वस्तु के ऊपर प्रधानता देते हैं। उनका यह भी मानना है कि प्रायः तथ्य और तकनीक का साथ-साथ उचित प्रयोग किया जाना चाहिए और यह संभव भी है। उत्तर व्यवहारवादियों अभिमत मे व्यवहारवादियों को चाहिए कि वे महत्वपूर्ण समसामयिक समस्याओं के साथ प्रयोजनात्मक रूप से अपने शोधकार्य की प्रासंगिकता स्थापित करे।

यदि यह करने में उसकी शोध तकनीक बाधा उत्पन्न करती है, तो भले ही तकनीक का त्याग कर दे पर प्रासंगिकता को न छोड़े। व्यवहारवादिया का यह नारा था “अस्पष्ट होना जितना बुरा था, गलत होना उतना बुरा नहीं।’ उत्तरवादियों का एक नारा है” अप्रासंगिक सुनिश्चितता से अस्पष्ट होना कम बुरा था।

समस्याओं के विश्वसनीय निदान की आवश्यकता

उत्तर-व्यवहारवादियों के अनुसार राजनीति विज्ञान को विश्लेषण, विशिष्ट शब्दावली के विकास अमूर्तिकरण आदि में कम रुचि लेना चाहिए तथा मानव जाति की आवश्यकताओं को पूरा करने तथा उनकी समस्याओं के समाधान करने में सहायता करनी चाहिए। व्यवहारवाद के अमूर्त प्रत्ययों तथा अवधारणाओं में सामाजिक समस्याओं के समाधान करने की क्षमता नहीं है।

कुछ समस्यायें ऐसी है जिनका तुरन्त समाधान नहीं किया जाता है तो वे सारी मानवता को नष्ट कर सकती है जैसे बढ़ती हुई जनसंख्या, दूषित वातावरण अणु बम का भय, राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर गरीबी तथा दूसरी ओर विपुल संपन्नता का सह अस्तित्व आदि। राजनीतिशास्त्र का औचित्य तभी सर्वमान्य होगा जब समाज में व्याप्त विषमताओं, आकांक्षाओं, संघर्षो, चिन्ताओं एवं सन्दर्भों का उचित समाधान किया जाये। उत्तर-व्यवहारवाद का मूल लक्ष्य राजनीतिशास्त्र की सहायता करना है जिससे इन समस्याओं से बचा जा सके।

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उत्तर व्यवहारवाद

कर्मनिष्ठ विज्ञान

व्यवहारवादियों ने कर्मनिष्ठता पर बल देते हुए कहा है कि राजनीतिक विषयों के अध्ययनकर्ता को समाज के पुनर्निमाण कार्य में व्यस्त होना चाहिए। उनके मतानुसार, ज्ञान व्यावहारिक रूप से सार्थक होना चाहिए। यदि हमारे व्यवहारवादी शोध, निष्कर्षो का रचनात्मक क्रियान्चन न ही हो सकता तो वह ज्ञान सार्थक नहीं है। इस सम्बन्ध में डेवि ईस्टन ने कहा है, “जाने का अर्थ है कार्य करने का उत्तरदायित्व अपने हाथों में लेना और कार्यरत होने का अर्थ है समाज के पुनर्निर्माण में अपने को लगा देना।” उत्तर व्यवहारवादियों का कहना है कि कोरे चिन्तन की ओर उन्मुख ज्ञान की जगह पर प्रत्येक शोधकर्ता को ऐसे शोध करने चाहिए जिससे समस्याओं के समाधान में सहायता मिले।

बुद्धिजीवियों की भूमिका

उत्तर व्यवहारवादियों ने राजनीतिशास्त्रियों को यह बताना चाहा कि बुद्धिजीवी हानि के नाते समाज में उसकी एक भूमिका है। राजनीतिक वैज्ञानिक बुद्धिजीवी होने के नाते यदि मानवीय मूल्यों के प्रति प्रतिबन्ध नहीं है तो वह अपनी उचित भूमिका नहीं निभाता बल्कि अपने दायित्वों से मुक्त हो जाता है। सभ्यता के मानवीय मूल्यों के संरक्षण में अधिक प्रयत्नशील होना उनका मुख्य उत्तरदायित्व था।

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मूल्यों की महत्वपूर्ण भूमिका

उत्तर-व्यवहारवादियों के अनुसार व्यवहारवादियों को चाहिए कि अपने ज्ञान की सीमायें पहचानने के लिए उन आधारभूत मूल्यों को पहचाने जिन पर वह ज्ञान टिका है। क्योंकि कोई भी ज्ञान विशेषकर सामाजिक विज्ञान मूल्यांत्मक दृष्टि से न तो तथ्यों एवं प्रासंगिक यथार्थताओं से तटस्थ रहा है और न ही रह सकता है। व्यवहारवादी सदैव मूल्यों के महत्व को अस्वीकार नहीं करते थे फिर भी विज्ञानवाद तथा मूल्य निरपेक्ष दृष्टिकोण पर इतना जोर दिया था कि व्यवहारिक दृष्टि से मूल्यों को, सर्वथा अपेक्षणीय मान लिया था। जिसके कारण राजनीति विज्ञान नीरस प्रयोजनहीन बन गया।

व्यवसाय का राजनीतिकरण

राजवैज्ञानिक समाज की राजनैतिक गर्मागर्मियों में अपने को सम्मिलित नहीं करते हैं जबकि उत्तर व्यवहारवादियों का यह मानना है कि राजनीतिशास्त्रियों को समाज में सकारात्मक भूमिका अदा करनी चाहिए। जिससे समाज के लक्ष्यों को एक उचित एवं व्यवस्थित दिशा दी जा सके। अतः बुद्धिजीवियों के संघों और समुदायों को भी मानव मूल्यों की रक्षात्मक संघर्ष के क्षेत्र में उतरना चाहिए। उनके व्यवसाय का राजनीतिकरण अनिवार्य है।

CSJMU BEd Semester Syllabus, उत्तर व्यवहारवाद कहां तो
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राजनीति विज्ञान अर्थशास्त्र संबंध व अंतरराजनीति विज्ञान इतिहास संबंध अंतरराजनीति विज्ञान भूगोल संबंध अंतर
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कानून अर्थ परिभाषान्याय अर्थ परिभाषा
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